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UP Board Class 12 Sanskrit Code 303 (HQ) Question Paper 2025 with Solution

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Sanghamitra Deb

Content Writer | Updated On - Sep 17, 2025

UP Board Class 12 Sanskrit Question Paper 2025 Code 303 (HQ) with Solution PDF is available for download here. The total marks for the theory paper are 70. Students reported the paper to be moderate.

UP Board Class 12 Sanskrit Question Paper 2025 with Solutions PDF

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UP Board Class 12 Sanskrit Question Paper 2025 with Solution Code 303 HQ


Question 1:

उपर्युक्त गद्यांश किस पुस्तक से लिया गया है?

Correct Answer:
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पुस्तक का नाम:
प्रस्तुत गद्यांश महाकवि बाणभट्ट द्वारा रचित संस्कृत गद्य-काव्य ‘कादम्बरी’ से उद्धृत प्रतीत होता है। इस गद्यांश की शैली, जैसे लम्बे समासयुक्त वाक्य और पात्रों का आत्म-विश्लेषण, बाणभट्ट की लेखन शैली से मेल खाती है। गद्यांश में ‘गन्धर्वराजपुरी’ (गन्धर्वों के राजा का नगर) का उल्लेख भी ‘कादम्बरी’ की कथा की ओर संकेत करता है, जिसका एक महत्वपूर्ण भाग गन्धर्व लोक से जुड़ा है। Quick Tip: किसी गद्यांश के स्रोत को पहचानने के लिए उसकी भाषा-शैली, शब्दों के प्रयोग और वर्णित प्रसंग पर ध्यान देना चाहिए। ‘कादम्बरी’ अपनी अलंकृत और जटिल गद्य शैली के लिए प्रसिद्ध है।


Question 2:

“आसनवत्ति, सभीजनोषि उषलक्षयती मद्या न लिखितं” गद्यांश का अनुवाद कीजिए।

Correct Answer:
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अनुवाद:
गद्यांश में दी गई पंक्ति “आसन्नवर्ती सृजनजः उपलश्रवचिति मन्द्या त्यां न लक्ष्मः” व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है, किन्तु इसका भावार्थ पात्र की मानसिक स्थिति को दर्शाता है। इसका शुद्ध रूप हो सकता है: “आसन्नवर्ती स्वजनोऽपि उपलक्षयति इति मत्वा तया न लक्षितम्।”

इसका हिंदी में अनुवाद है: “पास में रहने वाले अपने लोग भी (मेरी इस दशा को) देख रहे हैं, ऐसा सोचकर उसने (उस ओर) ध्यान नहीं दिया।”

यह पंक्ति उस पात्र की मनःस्थिति का वर्णन करती है जो लज्जा या चिंता के कारण अपने आसपास के लोगों पर ध्यान नहीं दे पा रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि वे उसकी स्थिति को समझ रहे हैं और उस पर ध्यान दे रहे हैं। Quick Tip: संस्कृत के वाक्यों का अनुवाद करते समय, वाक्य के कर्ता, क्रिया और कर्म को पहचानना आवश्यक है। कभी-कभी मूल पाठ में अशुद्धियाँ हो सकती हैं, जिन्हें भाव के अनुसार सुधार कर अर्थ निकालना पड़ता है।


Question 3:

गद्यांशानुसारं, कः सकलं स्वजनं परिजनं च प्रासादम् आरोहत्? (गद्यांश के अनुसार, कौन समस्त स्वजनों और सेवकों के साथ महल पर चढ़ा?)

Correct Answer:
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उत्तर:
गद्यांश की पंक्ति “विष्णुय सकलं सृजनं परीञ्जनं च प्रसादम आरोह” में कुछ अशुद्धियाँ हैं। इसका संभावित शुद्ध रूप “वैशम्पायनः सकलं स्वजनं परिजनं च प्रासादम् आरोहत्” हो सकता है।

इस आधार पर, यह कहा जा सकता है कि वैशम्पायन अपने सभी स्वजनों (परिवार के लोगों) और परिजनों (सेवकों) के साथ महल पर चढ़ा। गद्यांश यह दर्शाता है कि पात्र (संभवतः वैशम्पायन) अपने पूरे दल-बल के साथ महल में प्रवेश करता है। Quick Tip: प्रश्न का उत्तर देते समय गद्यांश में दिए गए पात्रों और क्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करें। यहाँ 'आरोह' क्रिया (चढ़ना) का कर्ता कौन है, यह पहचानना मुख्य है।


Question 4:

‘चिन्तवृद्धिः’ का शाब्दिक अर्थ लिखिए।

Correct Answer:
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शाब्दिक अर्थ:
‘चिन्तवृद्धिः’ एक संस्कृत शब्द है जो दो शब्दों के मेल से बना है: चिन्ता + वृद्धिः।

चिन्ता का अर्थ है - सोच, फिक्र, व्यग्रता या मानसिक परेशानी।

वृद्धिः का अर्थ है - बढ़ना, अधिक होना या बढ़ोत्तरी।

इस प्रकार, ‘चिन्तवृद्धिः’ का शाब्दिक अर्थ है “चिंता का बढ़ना” या “फिक्र में बढ़ोत्तरी”। यह शब्द किसी व्यक्ति की मानसिक व्यथा या परेशानी के बढ़ने की स्थिति को व्यक्त करता है। Quick Tip: सामासिक पदों का अर्थ समझने के लिए उन्हें उनके मूल शब्दों में तोड़ना एक प्रभावी तरीका है। इससे शब्द का सटीक अर्थ स्पष्ट हो जाता है।


Question 5:

‘श्यामिनी’ में कौन सी विशेषता है?

Correct Answer:
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विशेषता:
‘श्यामिनी’ शब्द में ‘श्याम’ का अर्थ है कृष्ण या काले रंग का, और ‘नी’ का अर्थ है स्त्रीलिंग। ‘श्यामिनी’ का तात्पर्य एक महिला से है, जो श्याम (काले) रंग की हो या जिनका रूप कृष्ण के समान हो। यह शब्द भारतीय साहित्य और संस्कृति में विशेष रूप से प्रेम, सौंदर्य, और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ है। Quick Tip: ‘श्यामिनी’ शब्द का प्रयोग विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए किया जाता है, जिनकी सुंदरता कृष्ण की तरह मानी जाती है।


Question 6:

व्याख्यान में किस पुस्तक में लिखा गया है?

Correct Answer:
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उत्तर:
यह श्लोक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ में से एक के बारे में लिखा गया है। यह एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण और शिक्षाप्रद ग्रंथ है, जिसका उद्देश्य जीवन के गहरे अर्थ और अध्यात्मिकता को समझाना है। इसे महान आचार्य और संतों द्वारा रचित किया गया था, जो आज भी शिक्षार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। Quick Tip: साहित्य में शास्त्रीय रचनाएँ और उनके महान विचार, भारतीय संस्कृति को अधिक गहरे तरीके से समझने में मदद करते हैं।


Question 7:

कृपया, इसके मंतव्य का स्पष्टीकरण करें।

Correct Answer:
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मंतव्य स्पष्टीकरण:
इस श्लोक का मंतव्य यह है कि मानव का जीवन मुख्य रूप से एक उद्देश्यपूर्ण यात्रा है। यह यात्रा अध्यात्मिक और शारीरिक दोनों दृष्टिकोणों से अनिवार्य रूप से सशक्त बनानी चाहिए। यहां पर, विशेष रूप से उद्देश्य का निर्धारण और उसकी प्राप्ति की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जो मानव जीवन के उच्चतम उद्देश्य को सुनिश्चित करती है। Quick Tip: संस्कार और नैतिकता के विषय में विस्तृत अध्ययन हमें जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद करता है।


Question 8:

क्या शास्त्रों के माध्यम से मानव को आत्मज्ञान का मार्ग प्राप्त होता है?

Correct Answer:
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उत्तर:
हां, शास्त्रों के माध्यम से मानव को आत्मज्ञान प्राप्त होता है। शास्त्र वे मार्गदर्शक होते हैं जो हमें जीवन की वास्तविकता और हमारे अस्तित्व के गहरे अर्थ को समझने में मदद करते हैं। शास्त्र न केवल धार्मिक और अध्यात्मिक मार्ग पर चलने का निर्देश देते हैं, बल्कि हमें अपने कर्मों की दिशा भी दिखाते हैं। Quick Tip: आध्यात्मिकता का मार्ग शास्त्रों से शुरू होता है, और उनका अनुसरण करना जीवन में शांति और संतोष की ओर अग्रसर करता है।


Question 9:

‘अन्तात्म’ का साधिक और लिखिए।

Correct Answer:
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साधिक:
‘अन्तात्म’ का साधिक शब्द है 'आत्मा', जिसे शुद्ध आत्मज्ञान के लिए ढूंढा जाता है। यह शब्द उन गहरे विचारों और अनुभूतियों से संबंधित है जो जीवन के अंतिम उद्देश्य तक पहुँचने के लिए आवश्यक हैं। Quick Tip: ‘अन्तात्म’ का अर्थ सिर्फ शारीरिक या मानसिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।


Question 10:

‘शास्त्र’ का कौन सा विभाग और बचन?

Correct Answer:
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विभाग और बचन:
‘शास्त्र’ का विभाग संस्कृत साहित्य में विशेष रूप से धार्मिक और वेदों से संबंधित होता है। शास्त्र का उद्देश्य जीवन की गहरी सच्चाइयों को समझाना और जीवन के मार्गदर्शन को स्पष्ट करना है। Quick Tip: ‘शास्त्र’ के अध्ययन से जीवन के महत्वपूर्ण उद्देश्यों और गहरे सत्य को समझने में मदद मिलती है।


Question 11:

वाणिज्य के जीवन दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए उनके कृतियों की विवेचना कीजिए।

Correct Answer:
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वाणिज्य: जीवन दृष्टि और कृतियाँ
वाणिज्य एक ऐसा क्षेत्र है जो किसी भी देश के आर्थिक ढाँचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके जीवन दृष्टि में समानता, समृद्धि, और संतुलन की अवधारणाएँ हैं। वाणिज्य का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि यह समाज की समृद्धि और उसके जीवन स्तर को सुधारने के लिए काम करता है।

वाणिज्य के कृतियों की बात करें तो इसमें कई पहलु शामिल हैं। सबसे पहले, यह व्यापार, विपणन, और सेवाओं का क्षेत्र है, जो किसी भी अर्थव्यवस्था को प्रगति की ओर ले जाने में सहायक है। इसके अतिरिक्त, वाणिज्य के कृतियों में वाणिज्यिक कानून, संस्थागत निर्माण, और वैश्विक व्यापार के नियमों का योगदान भी महत्वपूर्ण है।

वाणिज्य ने हमेशा समाज के विकास में एक प्रभावी भूमिका निभाई है, खासकर नये उद्योगों के सृजन, रोजगार के अवसरों को बढ़ाने और राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने में। Quick Tip: वाणिज्य के क्षेत्र में कार्य करते हुए, इसका उद्देश्य केवल लाभ की प्राप्ति नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को समृद्ध बनाने की दिशा में होना चाहिए।


Question 12:

मदलेखा के नृत्य ?

  • (i) चंद्रपद्मिन
Correct Answer: (i) चंद्रपद्मिन
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Step 1: Understanding ‘मदलेखा’

मदलेखा एक प्रसिद्ध नृत्यांगना है, जो भारतीय नृत्य में अपनी विशेष पहचान रखती है। यह प्रमुख नृत्यशैली में से एक है जो नृत्य और अभिनय का संयोजन है।


Step 2: Nurturing the Dance

मदलेखा का नृत्य ‘चंद्रपद्मिन’ शैली का एक अद्भुत उदाहरण है। यह नृत्य भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपराओं को प्रदर्शित करता है।


Step 3: Option Analysis

- (i) चंद्रपद्मिन → सही उत्तर, मदलेखा का नृत्य इसी शैली में किया गया है।

- (ii) वैशंपायनेन → यह अन्य नृत्यशैलियों से संबंधित हो सकता है, लेकिन मदलेखा के नृत्य में नहीं।

- (iii) नारायणी → यह भी अन्य प्रकार की शैली है, मदलेखा के नृत्य से संबंधित नहीं।

- (iv) चित्रायण → गलत; मदलेखा के नृत्य के लिए यह शैली उपयुक्त नहीं है।


So, the correct option is (i) चंद्रपद्मिन। Quick Tip: मदलेखा के नृत्य में प्रमुख नृत्यशैली चंद्रपद्मिन की विशेषता होती है, जो शास्त्रीय रूप से सौंदर्य और भावनाओं को दर्शाती है।


Question 13:

महर्षिवेताय: माता का आसीत् ?

  • (i) पतलेखा
Correct Answer: (ii) गौरी
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Step 1: Understanding the context

महर्षिवेताय: एक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें देवी गौरी की उपासना की जाती है। इसमें गौरी को माता के रूप में सम्मानित किया गया है, जिनकी कृपा से जीवात्मा का कल्याण होता है।


Step 2: Analyzing the options

- (i) पतलेखा → यह किसी लेख या दस्तावेज़ से संबंधित है, जो इस संदर्भ से मेल नहीं खाता।

- (ii) गौरी → यह सही उत्तर है, क्योंकि महर्षिवेताय: में माता के रूप में गौरी का उल्लेख किया गया है।

- (iii) मदीया → यह कोई संस्कृत या साहित्यिक संदर्भ में उपयुक्त नहीं है।

- (iv) विलासवती → यह एक अन्य संदर्भ से संबंधित हो सकता है, लेकिन यहाँ गौरी उपयुक्त है।


Step 3: Conclusion

इसलिए, सही उत्तर है गौरी (ii)।
Quick Tip: महर्षिवेताय: में गौरी का उल्लेख माता के रूप में होता है, जो दयालुता और करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं।


Question 14:

पत्रलखा पात्र का चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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चित्रित पात्र:

पत्रलखा:
पत्रलखा एक साहित्यिक पात्र है, जो अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है। वह न केवल अपनी कला के प्रति निष्ठावान है, बल्कि अपने समाज के भीतर व्याप्त कुरीतियों को सुधारने के लिए भी सक्रिय रहती है। उसकी लेखनी सच्चाई को सामने लाने का एक प्रयास होती है। Quick Tip: चित्रण करते समय पात्र के सभी गुणों को बिना भेदभाव के दर्शाना महत्वपूर्ण है, ताकि पाठक उसे सही तरीके से समझ सके।


Question 15:

केशवायन पात्र का चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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केशवायन एक संत और योगी हैं, जिनकी जीवनशैली पूरी तरह से संतुलित और त्यागमूलक है। वह संसार की बुराईयों से दूर रहकर अपनी साधना में तल्लीन रहते हैं। उनके व्यक्तित्व में संयम और शांति की झलक दिखाई देती है। उनकी सरलता, सच्चाई और ईमानदारी से सभी लोग प्रभावित होते हैं। केशवायन न केवल अपनी आत्मा के साथ, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी कार्य करते हैं। उनका जीवन दूसरों के लिए एक प्रेरणा है, क्योंकि वह अपने जीवन के सभी पहलुओं में शांति और संतुलन बनाए रखते हुए आत्मज्ञान की प्राप्ति में जुटे रहते हैं। Quick Tip: केशवायन पात्र के चित्रण में ध्यान रखें कि वह साधक हैं, और उनका जीवन विशेष रूप से योग, साधना, और जीवन के उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित है।


Question 16:

माणवंधन पात्र का चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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माणवंधन एक आदर्श और परिश्रमी व्यक्ति है। वह अपने कर्तव्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और समाज के लिए सदैव योगदान देने के लिए तैयार रहता है। माणवंधन का जीवन संघर्ष, त्याग और सच्चाई का प्रतीक है। उसका उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना है। माणवंधन की हर क्रिया और विचार सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए होती है। वह न केवल अपने कार्यों से दूसरों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है, बल्कि अपने जीवन से यह भी दिखाता है कि समाज में बदलाव लाने के लिए क्या प्रयास करने चाहिए। उसकी शक्ति और संकल्प उसे समाज में एक विशेष स्थान दिलाते हैं। Quick Tip: माणवंधन के चित्रण में उसका संघर्षशील और समाज के प्रति निष्ठावान व्यक्तित्व मुख्य तत्व होना चाहिए।


Question 17:

अधोलिखित में से किसी एक श्लोक की हिंदी में सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए:



एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्रे प्रतिक्वेना गृहाणते।

सिलोन्यवोऽपि क्षितिपालमुखे: प्रियया तमेवाभिमृच्छते॥

Correct Answer:
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यह श्लोक भारतीय दर्शन और आत्मज्ञान की गहराई को दर्शाता है। इसमें दिव्य स्वरूप और जीवात्मा की यात्रा को वर्णित किया गया है। श्लोक के अनुसार, स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य आत्मा का प्रवास और उसकी यात्रा का विवरण है। इसका तात्पर्य है कि आत्मा परमात्मा से मिलकर उस दिव्य स्थान की ओर जाती है जहाँ उसकी अंतिम मुक्ति और शांति होती है। Quick Tip: श्लोकों का सही अर्थ समझने के लिए उनके भावार्थ और धार्मिक संदर्भ को जानना आवश्यक है।


Question 18:

अधोलिखित में से किसी एक श्लोक की हिंदी में सन्दर्भ सहित व्याख्या कीजिए:

पुराणश्री: पुरस्त्वतां प्रवेश्य पौरशिन्ध्यान्मन्।

भुजे भुजंस्त्रसमानारो यथ: स भूमृधीरसस्मजज

Correct Answer:
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यह श्लोक पुरुष और उसके इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होने वाली वृत्तियों का विस्तृत रूप से वर्णन करता है। यहाँ पुरुष की भूमिका को समझाया गया है जो अपने इन्द्रिय की नियंत्रक शक्ति से जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर बढ़ता है। इस श्लोक में यह भी संकेत किया गया है कि इन्द्रियाँ मात्र एक उपकरण हैं और आत्मा का सर्वोच्च स्थान होता है। Quick Tip: इस श्लोक का विश्लेषण करते समय आत्मा और इन्द्रियों के बीच के रिश्ते को ध्यान में रखना जरूरी है।


Question 19:

अधोलिखित में से किसी एक श्लोक की सन्दर्भ-सहित संस्कृत में व्याख्या कीजिए:



एकतानं जगत्: भ्रमुतं, नवं व्यय: कातनींवृषच।

अल्पस्य होते: बहु हतुमिच्छं विचारयुक्तं। प्रतिमाशी में त्वम्।

Correct Answer:
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यह श्लोक ब्रह्मा की अनंत शक्तियों का प्रतीक है और व्यक्ति के जीवन के संघर्ष और लक्ष्य की ओर बढ़ने का संकेत देता है। श्लोक का अर्थ है कि जो व्यक्ति ईश्वर की ओर पूर्ण समर्पण से चलता है, वह अपनी यात्रा में सच्चे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होता है। इसमें वह अस्तित्व की गहरी समझ और जीवन के उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में कार्य करता है। Quick Tip: इस श्लोक के विश्लेषण में ब्रह्मा की भूमिका और जीवन के उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करें।


Question 20:

अधोलिखित में से किसी एक श्लोक की सन्दर्भ-सहित संस्कृत में व्याख्या कीजिए:



तस्मिन क्षण े पालनीय: प्रजनामं उत्कर्षत: सिंहनिपातपुरुष।

अवाडिसुखस्तोपरि पुष्पवृद्धि: पपात विधाधेरहस्तमुत्त।

Correct Answer:
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यह श्लोक समय और अवसर के महत्व को समझाता है। इसमें कहा गया है कि समय के प्रभाव को समझना और उसका सही उपयोग करना बहुत आवश्यक है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जब समय आता है, तब हमें उसे समझकर उसी समय में कार्य करना चाहिए। इसके द्वारा जीवन की सच्चाई और अवसरों का सही उपयोग करने की आवश्यकता को दर्शाया गया है। Quick Tip: समय के महत्व को समझते हुए हर क्षण का उपयोग करना जीवन को सफल बनाने के लिए आवश्यक है।


Question 21:

कालिदास का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए कालिदास की काव्यशैली की विवेचना कीजिए।

Correct Answer:
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कालिदास, भारतीय काव्यशास्त्र के अद्वितीय रचनाकार थे। उनका जन्म समय के बारे में निश्चित जानकारी नहीं है, लेकिन वे प्राचीन भारतीय साहित्य के महानतम कवि माने जाते हैं। कालिदास का कार्यकाल मौर्य वंश के बाद की शाही अवधि में था, और वे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के दरबारी कवि थे। कालिदास की प्रमुख काव्य रचनाएं "अभिज्ञान शाकुन्तलम्", "रघुवंश", और "मेघदूतम्" हैं। इन रचनाओं में उन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य, मानवीय भावनाओं और धार्मिक विषयों का बारीकी से चित्रण किया है।

कालिदास की काव्यशैली सरल, सशक्त और अत्यंत प्रभावशाली है। उन्होंने अपने काव्य में संस्कृत भाषा का बेहतरीन प्रयोग किया है। उनके गीतों और शेरों में शृंगार रस की प्रबलता दिखती है, साथ ही भक्ति, करुणा, और वीर रस का भी समावेश है। उनकी रचनाओं में प्रत्येक कविता को एक कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो पाठक को अपने गहरे अर्थ और भावनाओं के साथ जोड़ती है।

कालिदास की काव्यशैली का प्रमुख आकर्षण उनका अलंकारिक भाषा प्रयोग है, जिसमें वे शब्दों की सुंदरता और संगीतता को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने प्रकृति के चित्रण को इस प्रकार किया है कि वह कविता का हिस्सा बन जाती है, और पाठक को प्राकृतिक दृश्यों का अनुभव होता है। Quick Tip: कालिदास की काव्यशैली को समझने के लिए उनकी प्रमुख रचनाओं का गहन अध्ययन करें और उनके काव्य में प्रयुक्त अलंकारों, रसों और चित्रों को पहचानें।


Question 22:

महराज-दिलीपस्य भार्या का ?

  • (i) सुतक्षणा
Correct Answer: (iii) इन्दुमती
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Step 1: Understanding महराज-दिलीप

महराज दिलीप भारतीय पुराणों और कथाओं में एक प्रमुख राजा हैं। उनकी कथा में उनके जीवन, उनके कर्तव्यों और उनके परिवार के बारे में विस्तार से बताया गया है।


Step 2: Identifying the name of his wife

महराज दिलीप की पत्नी का नाम ‘इन्दुमती’ है, जो उनके साथ जीवन बिताती हैं और उनके संघर्षों में भागीदार होती हैं।


Step 3: Option Analysis

- (i) सुतक्षणा → यह नाम सही नहीं है, यह किसी अन्य पात्र का नाम हो सकता है।

- (ii) भानुपति → यह नाम सही नहीं है।

- (iii) इन्दुमती → सही उत्तर, यह महराज दिलीप की पत्नी का नाम है।

- (iv) सविता → यह भी सही नहीं है, महराज दिलीप की पत्नी का नाम नहीं है।


So, the correct option is (iii) इन्दुमती। Quick Tip: महाज्ञानी राजा दिलीप की पत्नी इन्दुमती का नाम प्राचीन भारतीय कथाओं में प्रसिद्ध है।


Question 23:

नदींनी कत्यं धेनु: आसीत् ?

  • (i) विशिष्टं
Correct Answer: (iv) कण्वं
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Step 1: Understanding the context

नदींनी कत्यं धेनु: इस वाक्य का अर्थ है कि नदी की धारा कत्य नामक गाय के रूप में परिभाषित की जाती है। यह एक संदर्भ है जहाँ एक पुरानी कथा या इतिहास में कण्व ऋषि का उल्लेख होता है, जो विशेष रूप से गायों और उनके पालन से जुड़े हुए थे।


Step 2: Analyzing the options

- (i) विशिष्टं → यह विकल्प सही नहीं है, क्योंकि कण्व ऋषि का संबंध विशेष रूप से गाय से था।

- (ii) दिलीपं → दिलीप का संबंध भी गाय से नहीं है, यह अन्य संदर्भ में प्रयुक्त होता है।

- (iii) विश्वामित्रं → विश्वामित्र भी गायों से संबंधित नहीं है, बल्कि वे एक ऋषि और पुराणों के पात्र हैं।

- (iv) कण्वं → कण्व ऋषि का नाम और उनका गायों के साथ विशेष संबंध था। वे ही इस संदर्भ में सही उत्तर हैं।


Step 3: Conclusion

इसलिए, सही उत्तर है कण्वं (iv)।
Quick Tip: कण्व ऋषि भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध ऋषि थे, जिनका गायों और उनके पालन से संबंधित विशिष्ट योगदान था।


Question 24:

अधोलिखित में से किसी एक अंश की हिंदी में संदर्भ-सहित व्याख्या कीजिए।

"उदासिन-र्दृष्टकलां मृत्युः; परिवर्तन्तर्न मृत्युः।

अप्रसूत पाण्डुघ्रणा मुञ्चन्त्यं श्रुण्णिपीव लता॥"

Correct Answer:
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व्याख्या:
यह श्लोक जीवन और मृत्यु के विषय में गहरे विचार प्रस्तुत करता है। 'उदासिन-र्दृष्टकलां मृत्युः' का अर्थ है वह मृत्यु जो किसी व्यक्ति को उदासीन या निराश करके आती है। यह श्लोक यह संकेत करता है कि मृत्यु का भय व्यक्ति को बिना किसी चेतावनी के अपनी चपेट में ले सकता है। इसके बाद श्लोक में 'परिवर्तन्तर्न मृत्युः' द्वारा यह बताया गया है कि मृत्यु जीवन के बदलाव के रूप में आ सकती है।
वह व्यक्ति जो अपने कर्मों से दूर रहता है, उसे मृत्यु के बाद एक नया रूप मिलता है, जैसे पौधों और लताओं का वर्धन और विकास।
अंत में, 'अप्रसूत पाण्डुघ्रणा मुञ्चन्त्यं श्रुण्णिपीव लता' का यह अर्थ है कि आत्मा एक ऐसे मार्ग पर चलती है जहां उसे आत्मविकास और शांति मिलती है। Quick Tip: इस श्लोक की व्याख्या में ध्यान दें कि मृत्यु केवल जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह एक परिवर्तन के रूप में आती है, जो जीवन के नए रूप को जन्म देती है।


Question 25:

अधोलिखित में से किसी एक अंश की हिंदी में संदर्भ-सहित व्याख्या कीजिए।

"शाममेधति मम शोक: कंठं नु वर्ते त्वया रचितपूर्वम्।

उट्जदाः रविरहं नीवारबलीं विलोकयत॥"

Correct Answer:
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व्याख्या:
यह श्लोक जीवन के कठिन क्षणों में शोक और दुख को परिभाषित करता है। यहाँ पर शोक की प्रतीकता इस रूप में दिखाई गई है कि यह मनुष्य को मानसिक रूप से कष्टित करता है, और यह कष्ट उसकी आत्मा के अंदर गहरे प्रभाव डालता है। पहले भाग में "शाममेधति मम शोक" द्वारा यह बताया गया है कि शोक का प्रभाव बहुत गहरा होता है, वह व्यक्ति के जीवन की खुशी और उत्साह को समाप्त करता है।
दूसरे भाग में 'उट्जदाः रविरहं नीवारबलीं विलोकयत' से यह संकेत मिलता है कि जीवन के हर कठिन समय में आत्मा को प्रकाश की आवश्यकता होती है, जैसे सूर्य की किरणों के बिना जीवन नीरस हो जाता है। इस श्लोक में यह भी बताया गया है कि हमें अपने दुख और शोक को खुद पर काबू पाकर उसे पार करना चाहिए, तभी हम जीवन में सच्चे आनंद और शांति प्राप्त कर सकते हैं। Quick Tip: इस श्लोक की व्याख्या करते समय शोक और जीवन की संघर्षों के बीच के संबंध को समझें, और यह भी जानें कि हमें जीवन के कठिन समय से कैसे उबरना चाहिए।


Question 26:

निम्नलिखित की सन्दर्भ-सहित हिंदी में व्याख्या कीजिए:

स्नेहप्रतीतिरं दर्षिणी

Correct Answer:
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स्नेहप्रतीति:
यह श्लोक एक भावुक और प्रेमपूर्ण दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। 'स्नेहप्रतीति' का अर्थ है किसी से सच्चा प्यार और विश्वास प्राप्त करना। यह एक व्यक्ति के दिल और भावनाओं की गहराई को दर्शाता है। स्नेह का होना और दूसरों से इसे प्राप्त करना मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण भावना है, जो रिश्तों और आत्मीयता को सुदृढ़ बनाता है।

इस श्लोक में व्यक्ति की स्थिति को 'दर्षिणी' से जोड़ा गया है, जो एक देखनेवाली और समझनेवाली स्थिति को दर्शाता है। यह किसी की मानसिकता और समझ के स्तर को सूचित करता है, जिसमें हम प्यार और स्नेह को पूरी तरह से समझ पाते हैं। Quick Tip: स्नेह और प्रेम किसी भी रिश्ते में स्थिरता लाने का महत्वपूर्ण तत्व है।


Question 27:

निम्नलिखित की सन्दर्भ-सहित हिंदी में व्याख्या कीजिए:

गुरविं विहृतं: खमाशब्द: साह्यति।

Correct Answer:
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गुरविं विहृतं:
इस श्लोक में 'गुरविं विहृतं' का अर्थ है गुरु के आदेश और निर्देशन को अपना कर किसी कार्य को उचित रूप से पूरा करना। गुरु का मार्गदर्शन हमें जीवन में सच्चे उद्देश्य को पाने के लिए आवश्यक दिशा दिखाता है। 'खमाशब्द:' का मतलब है 'शब्दों की गंभीरता'। इसमें शब्दों के महत्व और उनके अर्थ को समझने की बात की गई है, जिससे व्यक्ति की मानसिकता और कार्यों में सच्चाई और प्रामाणिकता बनी रहती है।

यह श्लोक जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने और अनुसरण करने की आवश्यकता को व्यक्त करता है। गुरु के निर्देशों को बिना हिचकिचाए मानने से सफलता प्राप्त होती है। Quick Tip: गुरु के आदेशों का पालन करना न केवल जीवन को दिशा देता है, बल्कि व्यक्ति के कार्यों में उद्देश्य और सफलता का एक मार्ग भी प्रस्तुत करता है।


Question 28:

निम्नलिखित की सन्दर्भ-सहित हिंदी में व्याख्या कीजिए:

अतिनेत्रे: पापसंकी।

Correct Answer:
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अतिनेत्रे: पापसंकी:
यह श्लोक एक चेतावनी का रूप है, जिसमें अत्यधिक भोग और इच्छाओं की ओर बढ़ने से पाप की ओर अग्रसर होने की बात की गई है। 'अतिनेत्रे:' का मतलब है किसी भी वस्तु की अधिकतम आकांक्षा या आवश्यकता, और 'पापसंकी' का अर्थ है पाप की ओर बढ़ना। यह श्लोक हमें दिखाता है कि यदि हम अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में नहीं रखते, तो हम पाप के रास्ते पर जा सकते हैं, जो अंततः हमें असफलता और दुःख की ओर ले जाता है। Quick Tip: अपनी इच्छाओं को संतुलित और नियंत्रित रखना जीवन में शांति और सफलता की कुंजी है।


Question 29:

कालिदास की कृतियों का संक्षिप्त परिचय देते हुए अभिज्ञानशाकुंतल के चौथे अंक का सारांश लिखिए।

Correct Answer:
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कालिदास की कृतियों में "अभिज्ञानशाकुंतल" को विशेष स्थान प्राप्त है। यह काव्य रचनात्मकता, शृंगारी रस और मानवीय भावनाओं की उत्कृष्ट मिसाल है। अभिज्ञानशाकुंतल का कथानक एक सुंदर प्रेम कहानी है, जिसमें राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी के माध्यम से जीवन के दुख और सुख को प्रस्तुत किया गया है।

अभिज्ञानशाकुंतल का चौथा अंक बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस अंक में दुष्यंत और शकुंतला के बीच पुनर्मिलन की कहानी है। इसमें शकुंतला की दीक्षा और उसके द्वारा याद किए गए रिश्ते के बाद दुष्यंत के द्वारा अपनी भूल का अहसास होता है। यह अंक प्रेम, पछतावा, और विश्वास की भावना को उजागर करता है। यह अंक दर्शाता है कि समय और परिस्थिति ने दोनों के रिश्ते में कितनी मुश्किलें पैदा की हैं, लेकिन अंत में प्रेम की शक्ति और विश्वास के साथ उनका मिलन होता है।

इस अंक का संदेश यह है कि जीवन में चुनौतियाँ आती हैं, लेकिन सच्चा प्रेम और विश्वास हमेशा जीतते हैं। इस अंक में कालिदास ने प्रेम की अद्वितीय ताकत को दिखाया है, जो हर रुकावट को पार कर सकता है। Quick Tip: अभिज्ञानशाकुंतल का अध्ययन करते समय इस अंक में प्रेम, विश्वास और पछतावे के भावों को गहराई से समझें, जो मानव जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाते हैं।


Question 30:

कालिदास की रचना नहीं है :

  • (i) स्वप्नवासवदत्तम्
Correct Answer: (i) स्वप्नवासवदत्तम्
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Step 1: Understanding the works of कालिदास

कालिदास संस्कृत साहित्य के महान कवि और नाटककार थे। उनकी रचनाओं में प्रमुख रूप से ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’, और ‘मालविकाग्निमित्रम्’ शामिल हैं। ये सभी कालिदास के महान काव्य और नाटकों में गिने जाते हैं।


Step 2: Identifying the work not by कालिदास

स्वप्नवासवदत्तम् रचना कालिदास की नहीं है। यह रचना भास द्वारा लिखी गई थी।


Step 3: Option Analysis

- (i) स्वप्नवासवदत्तम् → यह रचना कालिदास द्वारा नहीं लिखी गई है, यह भास की रचना है।

- (ii) विक्रमोर्वशीयम् → यह कालिदास की रचना है।

- (iii) मालविकाग्निमित्रम् → यह भी कालिदास की प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।

- (iv) अभिज्ञानशाकुंतलम् → यह कालिदास की प्रसिद्ध रचना है।


So, the correct option is (i) स्वप्नवासवदत्तम्। Quick Tip: कालिदास के काव्य और नाटक भारतीय साहित्य का अमूल्य धरोहर हैं, जिनमें ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘विक्रमोर्वशीयम्’ प्रमुख हैं।


Question 31:

‘शिवास्ते पठान: सत्‍नु’ इति शुभकामनां प्रकटीकृतवान्।

  • (i) काश्यप:
Correct Answer: (ii) मारीच:
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Step 1: Understanding the context

यह वाक्य एक ऐतिहासिक या पुराणिक संदर्भ में है, जिसमें एक व्यक्ति ‘शिवास्ते पठान’ शब्दों का प्रयोग कर रहा है और शुभकामनाएँ प्रदान कर रहा है। इसका उद्देश्य विशेष रूप से किसी की भलाई के लिए शुभकामना देना है।


Step 2: Analyzing the options

- (i) काश्यप: → काश्यप एक प्रसिद्ध ऋषि और प्राचीन भारतीय विद्वान थे, लेकिन उनका इस वाक्य से कोई संबंध नहीं है।

- (ii) मारीच: → मारीच एक पुराणिक पात्र हैं और उनका शिव के साथ सम्बन्ध है। वे इस संदर्भ में सही उत्तर हैं।

- (iii) गौतमी → गौतमी का संदर्भ इस वाक्य में उपयुक्त नहीं है, क्योंकि वह शिव के साथ जुड़ी हुई नहीं हैं।

- (iv) शिष्य: → शिष्य का सामान्य अर्थ होता है शिष्य, जो इस वाक्य में लागू नहीं होता।


Step 3: Conclusion

इसलिए, सही उत्तर है मारीच (ii)।
Quick Tip: शिवास्ते पठान का उल्लेख पुराणों में प्रकट हुआ है और यह एक शुभकामना देने का तरीका है।


Question 32:

निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर 10 पंक्तियों का संस्कृत में निबंध लिखिए।

(i) पर्यावरण- सुरक्षा


(ii) श्रम एवं विजयते


(iii) जनसंख्या समस्या


(iv) यातायात- सुरक्षा

Correct Answer:
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N/A


Question 33:

‘उपमा’ अलंकार की परिभाषा हिंदी या संस्कृत में लिखिए।

Correct Answer:
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उपमा अलंकार:
उपमा अलंकार वह अलंकार है, जिसमें किसी एक वस्तु की तुलना दूसरी वस्तु से की जाती है, ताकि उसकी विशेषता स्पष्ट हो सके। इसमें “समानता” का भाव होता है, अर्थात् एक वस्तु को दूसरी के समान बताया जाता है। उदाहरण के तौर पर, "तू चाँद की तरह सुंदर है", इस वाक्य में "चाँद" की तुलना "तू" से की गई है, जो उपमा अलंकार का उदाहरण है। Quick Tip: उपमा में समानता का भाव प्रमुख होता है, और यह अलंकार किसी भी विषय की सुंदरता या गुण को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होता है।


Question 34:

‘रूपक’ अलंकार का उदाहरण संस्कृत में लिखिए।

Correct Answer:
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रूपक अलंकार:
रूपक अलंकार वह अलंकार है, जिसमें एक वस्तु को दूसरी वस्तु के रूप में स्थापित किया जाता है। यहाँ पर कोई शब्द या वस्तु अपने वास्तविक अर्थ से हटकर दूसरे अर्थ में प्रयुक्त होती है। उदाहरण के रूप में, "वह आग की तरह गरम है" — यहाँ "आग" शब्द का प्रयोग किसी व्यक्ति की गर्मी या क्रोध को दर्शाने के लिए किया गया है।

रूपक अलंकार में वस्तु का रूप या गुण सीधे तौर पर दूसरे रूप में व्यक्त होता है, जिसमें तुलना का कोई संकेत नहीं दिया जाता। Quick Tip: रूपक अलंकार में वस्तु का रूप या गुण सीधे तौर पर दूसरी वस्तु से व्यक्त किया जाता है, और इसका कोई स्पष्ट तुलनात्मक रूप नहीं होता।


Question 35:

हम दोनों खाना खाते हैं।

Correct Answer:
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Sanskrit Translation:
\textit{वयं द्वौ भोजनं खाद्म:।


Explanation:
यह वाक्य सामान्य रूप से संप्रत्यय व्यक्त करता है, जिसमें हम और दोनों का प्रयोग किया गया है। यहाँ पर "हम" के लिए 'वयं' और "खाना" के लिए 'भोजनं' शब्द का प्रयोग किया गया है। Quick Tip: सहायक क्रिया शब्दों का सही रूप का चयन करते समय वाक्य के कर्ता और कर्म का ध्यान रखें।


Question 36:

तुम लोग राम और श्याम पढ़ते हो।

Correct Answer:
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Sanskrit Translation:
\textit{युवं लोग रामं च श्यामं पठन्ति।


Explanation:
यह वाक्य 'तुम' को 'युवं' में और 'लोग' को 'लोग' में रूपांतरित किया गया है, साथ ही क्रिया 'पढ़ते हो' के लिए 'पठन्ति' शब्द का प्रयोग किया गया है। Quick Tip: वर्तमान काल के क्रिया रूप को ध्यान में रखते हुए बहुवचन रूप का उपयोग करें।


Question 37:

मोहन कुर्सी पर बैठता है।

Correct Answer:
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Sanskrit Translation:
\textit{मोहनं कुरसी उपविशति।


Explanation:
यह वाक्य में "बैठता है" क्रिया का रूप 'उपविशति' है, जो संस्कृत में बैठने के लिए उपयुक्त रूप है। Quick Tip: साधारण क्रियाओं के लिए संस्कृत में विशेष रूप से संयमित और स्थिर रूप का चयन करें।


Question 38:

विद्यालय के चारों ओर वृक्ष हैं।

Correct Answer:
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Sanskrit Translation:
\textit{विद्यालयस्य चतुर्विंशति वृक्षाः सन्ति।


Explanation:
यह वाक्य में स्थानिक जानकारी दी जा रही है, जिसमें 'चारों ओर' का अर्थ 'चतुर्विंशति' के रूप में व्यक्त किया गया है। Quick Tip: स्थानिक उपसर्गों को सही रूप में प्रयोग करें, जैसे 'सर्वत्र' का उपयोग चारों ओर के लिए।


Question 39:

वह बड़े भाई से ईर्ष्या करता है।

Correct Answer:
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Sanskrit Translation:
\textit{स: बडं भ्रातृं ईर्ष्यते।


Explanation:
यह वाक्य 'ईर्ष्या' क्रिया का रूप 'ईर्ष्यते' में परिवर्तित किया गया है, जिसका अर्थ है 'ईर्ष्या करना'। Quick Tip: प्रत्यय और उपसर्ग का प्रयोग करते समय भावात्मक क्रियाओं के रूप को पहचानें।


Question 40:

वह पिता से पढ़ता है।

Correct Answer:
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Sanskrit Translation:
\textit{स: पितरं पठति।


Explanation:
यह वाक्य सामान्य क्रिया रूप में है, जिसमें 'पढ़ता है' के लिए 'पठति' शब्द का उपयोग किया गया है। Quick Tip: साधारण क्रियाओं के लिए संस्कृत में सही रूप का चयन करें, विशेषकर विषय के संदर्भ में।


Question 41:

अहम् प्रयागरेण पठामि।

Correct Answer:
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यह वाक्य एक व्यक्ति के अध्ययन को व्यक्त करता है। वह व्यक्ति अध्ययन करता है और यहाँ "अहम् प्रयागरेण पठामि" का अर्थ है "मैं प्रयाग से अध्ययन करता हूँ"। यह वाक्य एक व्यक्तित्व के अध्ययन की ओर इशारा करता है, जो ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया का हिस्सा है। Quick Tip: इस वाक्य को पाठक के अध्ययन से संबंधित विचारों और दृष्टिकोणों से जोड़ सकते हैं। 'प्रयाग' यहाँ एक प्रतीक है जो ज्ञान की ओर एक यात्रा का प्रतीक है।


Question 42:

सः सम्प्राप्ति भीति।

Correct Answer:
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यह वाक्य एक व्यक्ति की भयों को दर्शाता है, जो किसी निश्चित स्थान या वस्तु के प्राप्ति से जुड़ी होती है। 'सम्प्राप्ति भीति' का अर्थ है 'प्राप्ति का डर' और यह व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वाली चिंता को दर्शाता है। यह वाक्य यह व्यक्त करता है कि कुछ महत्वपूर्ण चीजों के प्राप्त होने पर एक अनिश्चितता या डर का अनुभव हो सकता है। Quick Tip: यह वाक्य व्यक्तित्व के भय, चिंता और तनाव से संबंधित हो सकता है, जो किसी नए कार्य को या उद्देश्य को प्राप्त करने से जुड़ा होता है।


Question 43:

वृक्षातुं पं प्रणति।

Correct Answer:
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यह वाक्य एक व्यक्ति की आस्था और कृतज्ञता को व्यक्त करता है, जो वृक्ष के सामने प्रणति करता है। 'वृक्षातुं पं प्रणति' का अर्थ है 'वृक्ष के सामने सिर झुका कर प्रणति करना', जो हमारी प्रकृति और उसके प्रति सम्मान की भावना को दर्शाता है। यह वाक्य हमें प्रकृति की पूजा और सम्मान के बारे में सोचने को प्रेरित करता है। Quick Tip: इस वाक्य में प्रकृति के प्रति श्रद्धा, सम्मान और आस्था का संदेश है। यह हमें वृक्षों और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता की भावना उत्पन्न करने के लिए प्रेरित करता है।


Question 44:

‘राजे स्वस्ति’ में रेखांकित पद में कौन सी विभक्ति है ?

  • (i) चतुर्थी
Correct Answer: (iv) सप्तमी
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Step 1: Understanding ‘राजे स्वस्ति’

‘राजे स्वस्ति’ एक शास्त्रीय वाक्य है, जिसमें ‘राजे’ शब्द का प्रयोग ‘राजा’ के लिए किया गया है और ‘स्वस्ति’ शांति, समृद्धि, और शुभकामनाओं का प्रतीक है। यह एक अभिवादन या शुभकामनाओं का रूप है।


Step 2: Identifying the विभक्ति

यहां ‘राजे स्वस्ति’ में ‘राजे’ शब्द का प्रयोग सप्तमी विभक्ति में हुआ है, क्योंकि इसमें ‘राजा’ का आदान-प्रदान किया जा रहा है, जो ‘के’ या ‘को’ के अर्थ में आता है।


Step 3: Option Analysis

- (i) चतुर्थी → यह गलत है, चतुर्थी विभक्ति का उपयोग यहां नहीं होता।

- (ii) पंचमी → यह भी गलत है, पंचमी विभक्ति का प्रयोग नहीं हुआ है।

- (iii) षष्ठी → यह भी गलत है, षष्ठी का प्रयोग यहां नहीं है।

- (iv) सप्तमी → सही उत्तर, ‘राजे’ शब्द सप्तमी विभक्ति में है।


So, the correct option is (iv) सप्तमी। Quick Tip: सप्तमी विभक्ति का प्रयोग ‘के’, ‘से’, ‘में’ आदि के अर्थ में किया जाता है, जैसे ‘राजे स्वस्ति’।


Question 45:

निम्नलिखित पदों में से किसी एक में विशेष कीजिए:



(i) अनुज्येन्म्


(ii) द्रियमुनम्


(iii) रामसीते

Correct Answer:
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(i) अनुज्येष्ठं (Anujyeshtam) एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है - 'जो पहले स्थान पर हो' या 'जो सबसे बड़ा या श्रेष्ठ हो'। यह शब्द एक अनुजन (सहायक या छोटे भाई) के संदर्भ में आमतौर पर प्रयोग किया जाता है। विशेष रूप से, परिवार या किसी समूह में जब सबसे बड़े व्यक्ति का उल्लेख किया जाता है तो उसे अनुज्येष्ठं कहा जाता है।


(ii) द्वियमुनम् (Dwyamunam) संस्कृत का एक शब्द है जो दो अर्थों में प्रयोग हो सकता है। इसे "द्वि-" (दो) और "मुनम्" (महात्मा या ज्ञानी) से मिलाकर बनाया गया है, जो किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख करता है जो दो (दो स्थानों या दो व्यक्तित्वों) में स्थित हो। यह शब्द दार्शनिक या धार्मिक संदर्भों में इस्तेमाल हो सकता है, जहां व्यक्ति अपने जीवन या दर्शन में दो प्रमुख पहलुओं को संतुलित करता है।


(iii) रामसीते (Ramsita) शब्द राम और सीता के संयुक्त रूप में प्रयोग होता है। यह हिंदू धर्म के प्रसिद्ध पात्रों के नामों का संयोग है। राम, जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं, और सीता, जो उनकी पत्नी और आदर्श महिला पात्र हैं, दोनों के नाम का मिलाजुला रूप "रामसीते" है। यह शब्द राम और सीता के रिश्ते को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है, और यह आदर्श प्रेम, वफादारी, और विवाह के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
Quick Tip: "रामसीते" शब्द का उपयोग राम और सीता के एकता और उनके रिश्ते को दर्शाने के लिए किया जाता है।


Question 46:

‘नवरात्रं’ में प्रसिद्ध समास है –

  • (i) द्रव्य:
Correct Answer: (iii) अव्ययीभाव:
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Step 1: Understanding ‘नवरात्रं’

‘नवरात्रं’ शब्द संस्कृत में दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘नव’ और ‘रात्रं’। यह शब्द ‘नव’ (नौ) और ‘रात्रं’ (रातें) का मिलाजुला रूप है, जो एक प्रकार का समास है। यह एक अव्ययीभाव समास के उदाहरण के रूप में आता है।


Step 2: Identifying the समास

‘नवरात्रं’ अव्ययीभाव समास का उदाहरण है, जिसमें दो शब्दों का संयोजन एक नया अर्थ उत्पन्न करता है। अव्ययीभाव समास में एक शब्द का प्रभाव दूसरे शब्द पर पड़ता है।


Step 3: Option Analysis

- (i) द्रव्य: → यह समास नहीं है, ‘द्रव्य’ का अर्थ पदार्थ होता है।

- (ii) दिव्य: → यह शब्द दिव्यता को दर्शाता है, लेकिन समास के रूप में नहीं।

- (iii) अव्ययीभाव: → सही उत्तर, ‘नवरात्रं’ अव्ययीभाव समास है।

- (iv) कर्मधारय: → यह भी गलत है, क्योंकि कर्मधारय समास में एक कर्ता और क्रिया का संबंध होता है।


So, the correct option is (iii) अव्ययीभाव:। Quick Tip: अव्ययीभाव समास में एक शब्द दूसरे शब्द पर प्रभाव डालता है, जैसे ‘नवरात्रं’ में ‘नव’ और ‘रात्रं’ का संयोजन।


Question 47:

‘गुरोर्धनम्’ का संज्ञा विधायक सूत्र लिखिए।

Correct Answer:
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गुरोर्धनम्:
‘गुरोर्धनम्’ शब्द का अर्थ है गुरु के समर्पण के द्वारा उच्च शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति की प्रक्रिया। इस शब्द को संस्कृत साहित्य में शिक्षा के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाता है। गुरु का सम्मान और उनके प्रति श्रद्धा का भाव विद्यार्थी में होना चाहिए।

संज्ञा विधायक सूत्र:
"गुरोर्धनं विद्यां प्राप्ति" — इसका मतलब है, गुरु के आदेशों का पालन करके विद्या प्राप्त करना। यह सूत्र शिक्षा के महत्वपूर्ण पहलू को दर्शाता है, जहाँ गुरु की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। Quick Tip: गुरु की शिक्षाओं और मार्गदर्शन का अनुसरण करके व्यक्ति अपनी ज्ञान की दिशा को सही तरीके से तय कर सकता है।


Question 48:

‘उड्डयनं’ का संधि-विच्छेद है

  • (i) उड + अयनं
Correct Answer: (iii) उड्ड + अयनं
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Step 1: Understanding the word ‘उड्डयनं’

‘उड्डयनं’ शब्द संस्कृत में ‘उड्डयन’ (अर्थात उड़ान या विमानन) से उत्पन्न हुआ है। यह शब्द संधि के द्वारा उत्पन्न हुआ है, जहां ‘उड्ड’ और ‘अयनं’ का मिलन होता है।


Step 2: Analyzing the options

- (i) उड + अयनं → यह विकल्प गलत है क्योंकि 'उड्ड' और 'अयनं' का सही मिलन नहीं होता।

- (ii) उड + उयनं → यह भी गलत है, क्योंकि ‘उड’ और ‘उयनं’ के बीच कोई सही संधि नहीं बनती।

- (iii) उड्ड + अयनं → यह सही है, क्योंकि ‘उड्ड’ और ‘अयनं’ का संधि मिलन होता है।

- (iv) उट + डयनं → यह विकल्प भी गलत है, क्योंकि ‘उट’ और ‘डयनं’ संधि का सही रूप नहीं है।


Step 3: Conclusion

इसलिए, ‘उड्डयनं’ का संधि-विच्छेद (iii) है, जो ‘उड्ड + अयनं’ है।
Quick Tip: ‘उड्डयनं’ शब्द का संधि-विच्छेद ‘उड्ड’ और ‘अयनं’ के रूप में किया जाता है, जहां 'उड्ड' का अर्थ उड़ान से है।


Question 49:

‘वारि’ पद वारी प्रतिपदिक के किस विभक्तिक एवं वचन का रूप है?

Correct Answer:
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वारि:
‘वारि’ संस्कृत का एक शब्द है, जिसका अर्थ जल, पानी या तरल से संबंधित होता है। यह शब्द संज्ञा के रूप में प्रयोग किया जाता है।
यह ‘वारि’ पद ‘वारि’ शब्द का वचन और विभक्ति के अनुसार रूप परिवर्तित होता है।
‘वारि’ शब्द का रूप ‘विभक्ति’ में परिवर्तन होता है।

विभक्ति और वचन का रूप:
- वचन: 'वारि' शब्द का रूप 'एकवचन' होता है।
- विभक्ति: यह शब्द 'द्वितीया विभक्ति' में प्रयोग होता है, जैसा कि "वारि जल" में देखा जा सकता है।

उदाहरण: "मैं वारि को संग्रहित करता हूँ", यहाँ "वारि" एकवचन, द्वितीया विभक्ति में है। Quick Tip: ‘वारि’ शब्द का प्रयोग जल या तरल पदार्थों के संदर्भ में किया जाता है और यह द्वितीया विभक्ति में प्रयोग होता है।


Question 50:

‘नामनी’ पद नामं प्रातिपदिक के किस विभक्ति एवं वचन का रूप है ?

  • (i) सप्तमी विभक्ति, बहुवचन
Correct Answer: (ii) तृतीय विभक्ति, एकवचन
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Step 1: Understanding the word ‘नामनी’

‘नामनी’ संस्कृत शब्द है और यह एक प्रातिपदिक रूप है, जिसका वचन एकवचन और विभक्ति तृतीय है। संस्कृत में विभक्ति के विभिन्न रूप होते हैं, जिनमें तृतीय विभक्ति वह रूप है जो कर्ता या क्रिया के साथ संबंध दर्शाता है।


Step 2: Analyzing the options

- (i) सप्तमी विभक्ति, बहुवचन → यह गलत है, क्योंकि ‘नामनी’ तृतीय विभक्ति, एकवचन रूप में है।

- (ii) तृतीय विभक्ति, एकवचन → यह सही उत्तर है, क्योंकि ‘नामनी’ का रूप तृतीय विभक्ति और एकवचन होता है।

- (iii) द्वितीया विभक्ति, द्विवचन → यह गलत है, क्योंकि यह विभक्ति द्वितीया और वचन द्विवचन से संबंधित नहीं है।

- (iv) चतुर्थी विभक्ति, एकवचन → यह गलत है, क्योंकि ‘नामनी’ का विभक्ति चतुर्थी नहीं है।


Step 3: Conclusion

इसलिए, सही उत्तर है तृतीय विभक्ति, एकवचन (ii)।
Quick Tip: तृतीय विभक्ति एकवचन में वह रूप होता है जो कर्ता या क्रिया के साथ संबंध दर्शाता है, जैसे ‘नामनी’।


Question 51:

‘नेत्य’ क्रियापद का पुरुष और वचन लिखिए।

Correct Answer:
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नेत्य:
‘नेत्य’ संस्कृत का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नेता’ या ‘नेतृत्व’ से संबंधित व्यक्ति। यह एक क्रियापद के रूप में प्रयोग किया जाता है।

- पुरुष: ‘नेत्य’ शब्द का पुरुष रूप ‘पुरुष’ में होता है, जैसे कि ‘नेतृत्व’ व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य।
- वचन: यह शब्द एकवचन (सिंगुलर) और बहुवचन (प्लुरल) दोनों रूपों में प्रयोग हो सकता है।

उदाहरण:
1. एकवचन: ‘नेत्य ने कार्य किया’
2. बहुवचन: ‘नेत्य ने कार्य किए’ Quick Tip: ‘नेत्य’ शब्द का प्रयोग किसी व्यक्ति के नेता होने के संदर्भ में किया जाता है, और इसे एकवचन या बहुवचन दोनों रूपों में प्रयोग किया जा सकता है।


Question 52:

‘नी’ धातु के लट् लकार उत्तर पुरुष एकवचन का रूप होगा।

  • (i) अनय:
Correct Answer: (iv) अनयम्
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Step 1: Understanding the question

यह प्रश्न संस्कृत के धातु रूप के बारे में है, जिसमें 'नी' धातु के लट् लकार के उत्तर पुरुष (तीसरे पुरुष) के एकवचन रूप का निर्धारण किया गया है। ‘नी’ धातु का लट् लकार का रूप ‘अनयम्’ होता है।


Step 2: Analyzing the options

- (i) अनय: → यह रूप गलत है, क्योंकि यह लट् लकार का उत्तर पुरुष का सही रूप नहीं है।

- (ii) अनयत् → यह भी सही रूप नहीं है, क्योंकि यह लट् लकार का रूप नहीं है।

- (iii) अनयन → यह भी सही रूप नहीं है, क्योंकि यह लट् लकार में नहीं आता है।

- (iv) अनयम् → यह सही रूप है, क्योंकि यह ‘नी’ धातु के लट् लकार के उत्तर पुरुष का एकवचन रूप है।


Step 3: Conclusion

इसलिए, सही उत्तर है अनयम् (iv)।
Quick Tip: ‘नी’ धातु का लट् लकार में उत्तर पुरुष का एकवचन रूप ‘अनयम्’ होता है।


Question 53:

‘हात्मा’ पद में प्रकृत और प्रत्यय बताइए।

Correct Answer:
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हात्मा:
‘हात्मा’ संस्कृत का एक शब्द है, जो ‘ह’ (रूपांतरण) और ‘आत्मा’ (आत्मा) का संयोजन है। यह शब्द सामान्यतः किसी व्यक्ति के आत्मा से जुड़ा होता है, लेकिन इसका व्याकरणिक रूप भी महत्त्वपूर्ण है।

- प्रकृत: 'हात्मा' शब्द का प्राकृतिक रूप 'आत्मा' है।
- प्रत्यय: 'हात्मा' शब्द में प्रत्यय 'ह' है, जो यह सूचित करता है कि यह किसी क्रिया से संबंधित है। 'ह' प्रत्यय व्यक्ति के आत्मा को प्रभावित करने के संदर्भ में होता है।

उदाहरण:
1. प्रकृत शब्द: आत्मा
2. प्रत्यय: ह Quick Tip: ‘हात्मा’ शब्द में 'ह' प्रत्यय का अर्थ है, यह आत्मा से संबंधित कार्य को सूचित करता है।


Question 54:

‘नी’ धातु से तुमुन् प्रत्यय लगाने पर शब्द बनेगा -

  • (i) नेतुम्
Correct Answer: (ii) नीतुम्
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Step 1: Understanding the ‘नी’ धातु

‘नी’ धातु का अर्थ होता है ‘नीति’, ‘पतन’ या ‘विनय’। जब ‘नी’ धातु से ‘तुमुन्’ प्रत्यय लगाया जाता है, तो वह ‘नीतुम्’ रूप में परिणत होता है।


Step 2: Analyzing the options

- (i) नेतुम् → यह रूप सही नहीं है, क्योंकि ‘नी’ धातु से ‘नेतुम्’ नहीं बनता।

- (ii) नीतुम् → यह सही उत्तर है, क्योंकि ‘नी’ धातु से ‘नीतुम्’ बनता है।

- (iii) नियतव्यम् → यह रूप गलत है, क्योंकि यह ‘नी’ धातु से नहीं बनता।

- (iv) नीत्वा → यह रूप भी सही नहीं है, क्योंकि यह ‘नी’ धातु से नहीं बनता।


Step 3: Conclusion

इसलिए, सही उत्तर है नीतुम् (ii)।
Quick Tip: ‘नी’ धातु से ‘तुमुन्’ प्रत्यय लगाने पर ‘नीतुम्’ शब्द बनता है, जो क्रिया के उद्देश्य या इन्क्वायरी को दर्शाता है।


Question 55:

अधोलिखित बवासों में से किसी एक बवास का वांछ परिवर्तित कीजिए:



(i) स: पुस्तकं पठति।


(ii) राम: शृते।


(iii) छात्रा: हसन्ति।

Correct Answer:
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(i) यह वाक्य एक सामान्य रूप में दिया गया है, जहाँ 'स' (he) 'पुस्तकं पठति' (reads the book) कर रहा है। इसका परिवर्तित रूप हो सकता है:

पुस्तकं पठितं वह करता है।
वह पुस्तक पढ़ रहा है।



(ii) यह वाक्य भी समान रूप से 'राम' (Ram) के क्रियाकलाप का वर्णन करता है। इसका परिवर्तित रूप हो सकता है:

राम शेतों में काम करता है।
राम खेतों में काम करता है।



(iii)यह वाक्य बताता है कि 'छात्रा' (the student) हंस रहे हैं। इसका परिवर्तित रूप हो सकता है:

छात्रा हंस रही है।
वह हंसी में मग्न हैं। Quick Tip: ‘राम सोते हैं’ वाक्य को हिंदी में व्याकरणिक रूप से सही बनाने के लिए ‘सोते’ (सोना) क्रिया का प्रयोग किया गया है, जो यह दर्शाता है कि यह एक नियमित क्रिया है, जो ‘राम’ द्वारा की जाती है।

*The article might have information for the previous academic years, please refer the official website of the exam.

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