
CBSE Class 12 Hindi Elective exam was conducted on March 15, 2025 from 10:30 AM to 1:30 PM. 16.9 lakh students appeared for the exam across 7,330 centers in India and 26 other countries.
The Hindi Elective Question paper is divided into three parts: Reading Comprehension, Writing Skills, and Literature, with an aggregate of 80 marks for the theory paper and 20 marks given for internal assessment.
The paper contains a combination of Multiple Choice Questions (MCQs) (20%), Short Answer Questions (30%), and Long Answer Questions (50%), intended to measure students' understanding, language skill, and literary analysis.
CBSE Class 12 Hindi Elective Question Paper 2025 PDF (Set 2 - 29/1/2) is available for download here.
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‘धँसती ही जाती पृथ्वी में बड़ों-बड़ों की हस्ती’ — पंक्ति का आशय है —
इस पंक्ति में नश्वरता और जीवन के क्षणिक स्वरूप को व्यक्त किया गया है।
यह संदेश देती है कि चाहे कोई व्यक्ति कितना भी महान या शक्तिशाली क्यों न हो,
अंततः उसका अस्तित्व इस पृथ्वी में समाहित हो जाता है — यानी उसे नाश होना तय है।
‘बड़ों-बड़ों की हस्ती’ का ‘पृथ्वी में धँस जाना’ इस सत्य को उजागर करता है कि
किसी भी संसारिक शक्ति या स्थिति का स्थायित्व नहीं होता।
यह जीवन की अस्थिरता और उसकी क्षणभंगुरता को समझाने वाली पंक्ति है।
Quick Tip: कविता में प्रयुक्त प्रतीकों के अर्थ को समझने के लिए उनके दार्शनिक संदर्भ को पहचानना महत्वपूर्ण है, जिससे सही उत्तर तक पहुँचना आसान होता है।
शक्तिहीन का क्या हश्र होता है ?
यह प्रश्न जीवन की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है।
जो व्यक्ति शक्तिहीन होता है, वह जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों का सामना करने में असमर्थ होता है।
उसका न कोई प्रभावी अस्तित्व होता है और न ही समाज में उसे स्वीकार किया जाता है।
इसलिए, अंततः उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है — यानी वह समाज और इतिहास दोनों से गायब हो जाता है।
यह विकल्प ‘अस्तित्व नष्ट हो जाता है’ सबसे उपयुक्त है, क्योंकि यह व्यक्ति के सामर्थ्य के अभाव में उसका समूल नाश को दर्शाता है।
Quick Tip: जब विकल्पों में 'अंतिम परिणाम' से जुड़ा कोई प्रश्न हो, तो सोचें कि सबसे गहन और स्थायी प्रभाव क्या होगा, और उसी आधार पर उत्तर तय करें।
कविता के केंद्रीय भाव को दर्शाने वाले कथन है/हैं —
इस प्रश्न में कविता के केंद्रीय भाव को समझने की आवश्यकता है।
कविता का मुख्य संदेश यह है कि जीवन में संघर्ष और कठिनाइयाँ हैं, और वही व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है जो शक्तिशाली होता है।
(I) कथन इस विचार को स्पष्ट करता है कि संसार में जीवित रहने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है।
(II) कथन भी कविता की भावनात्मक तीव्रता को व्यक्त करता है, जहाँ हार मानने वाले व्यक्तियों के लिए मातृभूमि तक त्याग देती है, जो एक सशक्त भावनात्मक अभिव्यक्ति है।
(III) कथन कविता के केंद्रीय भाव से मेल नहीं खाता, क्योंकि कविता में विरोध नहीं, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक शक्ति और संघर्ष की बात की गई है।
इसलिए सही उत्तर है: (I) और (II) दोनों ही।
Quick Tip: केंद्रीय भाव को समझते समय कविता के समग्र स्वर और उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करें — शब्दों से अधिक, भावना को समझने की कोशिश करें।
अपने को विद्रोही कौन और क्यों मानते हैं ?
कविता में कवि स्वयं को विद्रोही मानता है।
वह इसलिए कि वह समाज की पारंपरिक, पलायनवादी और निष्क्रिय सोच का विरोध करता है।
कवि शक्ति को धर्म और निर्बलता को पाप मानता है, जो उसकी विद्रोही भावना को स्पष्ट करता है।
वह जीवन की कठिनाइयों से भागने की बजाय उनका सामना करने और शक्तिशाली बनने की प्रेरणा देता है।
कवि समाज में व्याप्त हीन भावना, आत्म-निराशा और आत्म-विस्मृति के खिलाफ विद्रोह करता है।
उसका यह विद्रोह केवल बाहरी व्यवस्था के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह आत्मबल के जागरण का आह्वान भी है।
वह कहता है कि जो अपनी क्षमताओं को पहचानते नहीं हैं, वे स्वयं से धोखा करते हैं — और इसलिए वह अपने आप को सच्चा विद्रोही मानता है।
Quick Tip: जब कोई कवि या लेखक स्वयं को ‘विद्रोही’ कहता है, तो यह सिर्फ विरोध का संकेत नहीं होता — इसमें बदलाव और जागरूकता की चेतना भी छिपी होती है।
इस काव्यांश के माध्यम से क्या सीख दी गई है ?
इस काव्यांश से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में अस्तित्व बनाए रखने के लिए शक्ति, साहस और आत्मबल आवश्यक हैं।
यह कविता जीवन को एक संघर्ष मानती है और बताती है कि केवल वे ही व्यक्ति टिकते हैं जो अपने सामर्थ्य का विकास करते हैं।
जो लोग संघर्ष से डरते हैं, जो हार मान लेते हैं — वे मिट जाते हैं, उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता।
कवि हमें बताता है कि शक्तिहीन व्यक्ति का हश्र अस्तित्वविहीनता होता है और शक्तिशाली बनने से ही समाज में प्रतिष्ठा मिलती है।
यह कविता आत्म-निरीक्षण, आत्मबल और कर्तव्यबोध की चेतना को जाग्रत करती है।
यह हमें जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने, आत्मबल विकसित करने और समाज में योगदान देने की प्रेरणा देती है।
Quick Tip: कविता की सीख को केवल शब्दों से नहीं, भावों और प्रतीकों से भी समझें — तभी उसका मर्म स्पष्ट होता है।
गर्जना करने वाले बादलों का, वृक्षों के मस्तक पर अभिषेक करना क्या दर्शाता है ?
यह पंक्ति अत्यंत प्रतीकात्मक और भाव-गर्भित है।
बादल जो आकाश में गरजते हैं — वे केवल गम्भीर ध्वनि नहीं करते, बल्कि अंततः बरसकर पृथ्वी की प्यास भी बुझाते हैं।
जब वही बादल वृक्षों के मस्तक (शीर्ष) पर जलधाराओं का अभिषेक करते हैं, तो यह दर्शाता है कि महान व्यक्ति केवल आडंबर नहीं करते, वे अपने कार्यों से भी संसार को लाभ पहुँचाते हैं।
यह पंक्ति इस बात का संकेत देती है कि शक्ति का उपयोग परोपकार में हो — यह आदर्श है।
गर्जना करने वाले बादल यदि बरसें नहीं, तो उनका अस्तित्व व्यर्थ है।
इसी तरह, जो शक्तिशाली हैं, उन्हें अपने सामर्थ्य का उपयोग दूसरों के कल्याण हेतु करना चाहिए।
यह पंक्ति हमें अहंकार रहित, सेवा भाव से युक्त सामर्थ्य की ओर प्रेरित करती है।
Quick Tip: प्राकृतिक प्रतीकों के पीछे छिपे नैतिक और दार्शनिक संकेतों को समझने का अभ्यास करें — इससे उत्तर अधिक गहन बनते हैं।
वर्ष 2024 का ‘पृथ्वी दिवस’ केंद्रित है –
हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘पृथ्वी दिवस’ विश्वभर में पर्यावरण जागरूकता का एक प्रमुख अवसर होता है। इसकी शुरुआत 1970 में हुई थी और तब से यह दिन वैश्विक समुदाय को प्रकृति के प्रति जागरूकता, संरक्षण और सतत विकास की दिशा में प्रेरित करता रहा है।
वर्ष 2024 का पृथ्वी दिवस “Planet vs. Plastics” थीम के साथ मनाया गया, जिसका आशय है — ‘पृथ्वी बनाम प्लास्टिक’।
इसका उद्देश्य था प्लास्टिक के खतरों को उजागर करना और 60% तक प्लास्टिक उत्पादन को वर्ष 2040 तक कम करने की वैश्विक मांग को मजबूत करना।
इस थीम के तहत स्कूलों, संगठनों, सरकारों और नागरिकों को यह संदेश दिया गया कि प्लास्टिक न केवल हमारे स्वास्थ्य के लिए बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी गंभीर संकट बन चुका है।
प्लास्टिक अपशिष्ट नदियों, महासागरों, मछलियों, पक्षियों और अंततः मानव शरीर में माइक्रोप्लास्टिक के रूप में प्रवेश कर रहा है। इससे कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और अन्य रोगों की आशंका बढ़ गई है।
इसलिए वर्ष 2024 का फोकस प्लास्टिक के विरुद्ध वैश्विक अभियान चलाने, पुनः प्रयोग को बढ़ावा देने, बायोडिग्रेडेबल विकल्पों को अपनाने और प्लास्टिक निर्मूलन के लिए नीति-निर्माताओं पर दबाव बनाने पर था।
पृथ्वी दिवस पर यह थीम विशेष रूप से युवाओं और स्कूलों के लिए प्रेरणादायक बनी, जिन्होंने स्वैच्छिक प्रयासों के माध्यम से प्लास्टिक फ्री कैंपेन, सफाई अभियान और पर्यावरणीय शिक्षा कार्यक्रमों में भाग लिया।
निष्कर्षतः, यह स्पष्ट है कि वर्ष 2024 में पृथ्वी दिवस का मुख्य केंद्रबिंदु प्लास्टिक ही था, न कि सामान्य रूप से पर्यावरण या जलवायु।
Quick Tip: लंबे उत्तर में विषय की पृष्ठभूमि, वर्तमान सन्दर्भ, समस्या का विस्तार और निष्कर्ष — इन सभी को क्रमशः जोड़ें। यह उत्तर को विश्लेषणात्मक और समृद्ध बनाता है।
गद्यांश में प्रयुक्त ‘सभी लोग जाग जाएँ’ का आशय है –
गद्यांश में ‘सभी लोग जाग जाएँ’ का प्रयोग एक रूपक के रूप में किया गया है, जो पाठकों को पर्यावरणीय संकट के प्रति जागरूक करने का आह्वान करता है।
आज पृथ्वी प्लास्टिक, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से संकट में है। ऐसे में लेखक का यह कहना कि “सभी लोग जाग जाएँ” — एक चेतावनी है कि यदि हम समय रहते सचेत नहीं हुए, तो हमारा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संकट में पड़ सकता है।
यह वाक्य केवल शाब्दिक जागरण नहीं बल्कि चेतना, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता की आवश्यकता को दर्शाता है। इसमें भाव है कि हर व्यक्ति को पृथ्वी की रक्षा को व्यक्तिगत और सामूहिक दायित्व समझकर सक्रिय होना चाहिए।
इसलिए सही उत्तर है: (A) पृथ्वी की रक्षा के प्रति सचेत हो जाएँ।
Quick Tip: ‘जागना’ जैसे शब्द प्रतीकात्मक होते हैं — इनका आशय केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक चेतना से होता है। ऐसे शब्दों के संदर्भ को समझना बहुत ज़रूरी होता है।
पृथ्वी की माँ से तुलना का आधार है –
पृथ्वी को 'माँ' कहे जाने का आधार केवल सांस्कृतिक या भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक भी है। जिस प्रकार माँ अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है, उन्हें आहार, सुरक्षा और पोषण प्रदान करती है — उसी प्रकार पृथ्वी भी हमें जल, अन्न, खनिज, वायु, वनस्पति, पशु और सभी आवश्यक प्राकृतिक संसाधन देती है।
माँ की तरह ही पृथ्वी भी बिना किसी भेदभाव के अपने सभी जीवों की देखभाल करती है और उनका जीवन चक्र चलाती है। यह गुण पालन-पोषण का सबसे बड़ा प्रतीक है।
इसलिए ‘माँ’ की उपमा पृथ्वी को देना सर्वथा उपयुक्त है और इसका आधार है: (A) पालन-पोषण का गुण।
Quick Tip: ‘पृथ्वी = माँ’ जैसी उपमाएं जब दी जाती हैं, तो इनके पीछे मौजूद कार्य या गुण को पहचानना जरूरी होता है — केवल भावात्मक संदर्भ पर्याप्त नहीं होता।
प्रकृति के प्रति गांधीजी का क्या दृष्टिकोण था ?
गांधीजी का प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत सह-अस्तित्व आधारित था। वे प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि पूजनीय मानते थे। उनका मानना था कि मनुष्य को प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जितनी उसे आवश्यकता हो, लालच नहीं करना चाहिए।
उन्होंने ‘ट्रस्टीशिप’ का सिद्धांत दिया — जिसके अनुसार मनुष्य को प्राकृतिक संसाधनों का रक्षक बनकर, भावी पीढ़ियों के हित को ध्यान में रखते हुए उन्हें उपयोग करना चाहिए।
गांधीजी के अनुसार, प्रकृति और मानव के बीच संतुलन आवश्यक है, वरना संसाधनों का क्षय और नैतिक पतन दोनों होंगे।
Quick Tip: गांधीजी के विचारों में सादगी, संयम और सह-अस्तित्व की भावना थी — जो पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांत हैं।
बढ़ती हुई आबादी के कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं ?
बढ़ती जनसंख्या के कारण अनेक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इनमें प्रमुख हैं —
1. प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन
2. रोजगार, जल, भोजन और आवास की कमी
3. वनों की कटाई और जैव विविधता में ह्रास
4. प्रदूषण में वृद्धि — वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण
5. स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा पर दबाव
इन दुष्परिणामों से न केवल पर्यावरण असंतुलित हो रहा है, बल्कि सामाजिक असमानता और गरीबी भी बढ़ रही है।
Quick Tip: जब भी आप जनसंख्या विषय पर लिखें, तो "प्राकृतिक संसाधनों पर प्रभाव" और "सामाजिक-आर्थिक परिणाम" दोनों को अवश्य जोड़ें।
गैर-नवीकरणीय ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा के अंतर को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
गैर-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत: वे स्रोत जो सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं और पुनः निर्मित नहीं हो सकते, जैसे — कोयला, पेट्रोलियम, डीजल, प्राकृतिक गैस।
नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत: वे स्रोत जो प्रकृति द्वारा निरंतर उपलब्ध होते हैं और पुनः उपयोग योग्य होते हैं, जैसे — सूर्य की ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत, जैविक अपशिष्ट से ऊर्जा।
मुख्य अंतर: गैर-नवीकरणीय ऊर्जा पर्यावरण को अधिक प्रदूषित करती है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा स्वच्छ, हरित और दीर्घकालिक होती है।
Quick Tip: हर उत्तर में उदाहरण ज़रूर दें — जैसे "सौर ऊर्जा" या "कोयला" — यह उत्तर को स्पष्ट और प्रभावशाली बनाता है।
प्रकृति की रक्षा प्रत्येक मनुष्य के लिए क्यों आवश्यक है ?
प्रकृति ही मानव जीवन का मूल आधार है। वायु, जल, भोजन, औषधियाँ, ऊर्जा — सब प्रकृति से प्राप्त होते हैं। यदि प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, तो मानव जीवन संकट में पड़ जाता है।
प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी — ये सभी समस्याएं तब उत्पन्न होती हैं जब मनुष्य प्रकृति का दोहन करता है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह वृक्ष लगाए, जल बचाए, प्लास्टिक का उपयोग कम करे और पर्यावरणीय चेतना को बढ़ाए।
केवल सरकार नहीं, बल्कि हर नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी।
Quick Tip: पर्यावरण विषयों पर उत्तर लिखते समय "व्यक्तिगत जिम्मेदारी" को ज़रूर शामिल करें — यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है।
नाटक प्रतियोगिता में जब मैंने महिला पात्र का अभिनय किया — लगभग 100 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए :
हमारे विद्यालय में वार्षिक नाट्य प्रतियोगिता आयोजित की गई थी, जिसमें मुझे एक ऐतिहासिक नारी पात्र का अभिनय सौंपा गया — रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका।
पहले तो मुझे संकोच हुआ कि मैं एक महिला पात्र को कैसे निभा पाऊँगा, लेकिन जब मैंने उसकी जीवनी पढ़ी, उसके संवादों को आत्मसात किया, तब समझ आया कि यह केवल अभिनय नहीं, बल्कि उस स्त्री की भावना को मंच पर जीना है।
मैंने उसकी वेशभूषा, चाल, हाव-भाव और मुख-मुद्राओं को अभ्यास के ज़रिए साकार किया।
जैसे ही मंच पर प्रवेश किया और संवाद बोले — "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी", तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
उस क्षण मैंने समझा कि एक कलाकार के लिए लिंग नहीं, भाव और प्रस्तुति प्रधान होती है।
यह अनुभव न केवल अभिनय की दृष्टि से बल्कि स्त्री-शक्ति की समझ के स्तर पर भी मेरे लिए प्रेरणादायक रहा।
उस दिन मुझे अभिनय के माध्यम से स्त्री संवेदना, संघर्ष और शक्ति को दर्शाने का अवसर मिला, जिसे मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा।
Quick Tip: ऐसे लेखन में भावनाओं, मंचीय अनुभव, और आत्मबोध को केंद्र में रखें — पाठक जुड़ाव अनुभव करता है।
खेलों से प्रतिस्पर्धा की सच्ची भावना — लगभग 100 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए :
खेल केवल शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं होते, बल्कि वे चरित्र निर्माण, अनुशासन और आत्म-नियंत्रण का माध्यम भी होते हैं।
मैंने जब पहली बार अपनी स्कूल की फुटबॉल टीम में भाग लिया, तब लगा कि प्रतियोगिता का मतलब है — हर हाल में जीतना।
लेकिन जैसे-जैसे खेल में अनुभव बढ़ा, मैंने जाना कि सच्ची प्रतिस्पर्धा वह होती है जहाँ हम अपनी श्रेष्ठता को साबित करने के साथ-साथ विरोधी का सम्मान भी बनाए रखते हैं।
हमारी टीम ने एक बार फाइनल मैच बहुत करीबी अंतर से हारा, लेकिन विरोधी टीम की खेल भावना, सहयोग और हार्दिकता ने हमें सीख दी कि खेल में पराजय से बड़ा मूल्य 'सम्मान' है।
वास्तव में, खेलों में ईमानदारी, टीम भावना, और हार को स्वीकारने की शक्ति — ये ही प्रतिस्पर्धा की सच्ची भावना हैं।
खेल हमें सिखाते हैं कि जीवन भी एक मैदान है, जहाँ हार-जीत से ज़्यादा ज़रूरी होता है — प्रयास और संयम।
Quick Tip: खेल आधारित लेखन में केवल परिणाम नहीं — प्रक्रिया, मनोविज्ञान और मूल्यबोध को भी शामिल करें।
वरिष्ठ व्यक्तियों के प्रति हमारे कर्तव्य — लगभग 100 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए :
वरिष्ठ नागरिक समाज की वह निधि हैं, जिनके अनुभवों से हम सीखकर अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।
हमारे माता-पिता, दादा-दादी, गुरुजन — इन सभी ने जीवन में संघर्ष किया है, जिसने उन्हें परिपक्व और मार्गदर्शक बनाया है।
हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें न केवल सम्मान दें, बल्कि उनके अनुभव को सुनें, समझें और अपनी दिनचर्या में उन्हें स्थान दें।
आज की तेज़ी से भागती दुनिया में बुज़ुर्गों को उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, जो चिंताजनक है।
वरिष्ठों की देखभाल केवल भौतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक समर्थन भी उतना ही आवश्यक है।
उन्हें बातचीत, सैर, पूजा-पाठ, और पारिवारिक फैसलों में भागीदार बनाना — हमारे कर्तव्यों का हिस्सा होना चाहिए।
क्योंकि आज जो वरिष्ठ हैं, कल हम होंगे — और जैसा व्यवहार हम आज करेंगे, वही हमारे भविष्य का प्रतिबिंब बनेगा।
Quick Tip: ऐसे विषयों पर लेखन करते समय केवल कर्तव्यों की सूची न दें — सहानुभूति और व्यवहारिक उदाहरण शामिल करें।
चित्रकला, संगीतकला या नृत्यकला की तरह कविता लेखन की कला सिखाई क्यों नहीं जा सकती? स्पष्ट कीजिए।
कविता लेखन एक ऐसी कलात्मक अभिव्यक्ति है, जो केवल तकनीकी ज्ञान से नहीं सीखी जा सकती।
चित्रकला, संगीत या नृत्य की भाँति कविता के भी कुछ नियम होते हैं, जैसे लय, छंद, अलंकार, परंतु ये केवल बाह्य ढाँचा प्रदान करते हैं।
कविता की आत्मा होती है — भाव, अनुभूति और संवेदना।
जब तक व्यक्ति के भीतर गहन संवेदनशीलता, कल्पना शक्ति और आत्मानुभूति न हो, वह कविता नहीं रच सकता।
इसे मात्र अभ्यास से नहीं, बल्कि भीतर की चेतना और अभिव्यक्ति की आकुलता से ही पैदा किया जा सकता है।
इसलिए कविता लेखन पूरी तरह सिखाई नहीं जा सकती — यह आत्मबोध और आत्मविकास से उपजती है।
Quick Tip: सृजनात्मक विधाओं का मूल तत्व केवल विधि नहीं, बल्कि भीतर से उपजी भावना होती है — यह उत्तर में अवश्य झलके।
नाटक के मंच-निर्देश हमेशा वर्तमान काल में ही क्यों लिखे जाते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
नाटक के मंच-निर्देश दर्शकों और कलाकारों के लिए तत्क्षणिक क्रिया का संकेत होते हैं।
चूंकि नाटक एक जीवंत मंचीय माध्यम है, इसमें हर क्रिया मंच पर ‘अभी’ हो रही होती है।
इसलिए निर्देश भी वर्तमान काल में ही दिए जाते हैं, जैसे — "अभिनेता धीरे से प्रवेश करता है", "पृष्ठभूमि में संगीत बजता है", "पात्र चौंककर बोलता है"।
वर्तमान काल मंच पर गतिशीलता और सजीवता का आभास कराता है, जिससे दर्शक और अभिनेता दोनों दृश्य से जुड़ाव अनुभव करते हैं।
यदि निर्देश भूतकाल में लिखे जाएँ, तो वे दृश्य की सक्रियता और सजीवता को बाधित कर देंगे।
Quick Tip: उदाहरण सहित कारण स्पष्ट करें — जैसे “दाएँ ओर जाता है” बनाम “गया” — इससे काल प्रयोग का महत्त्व उजागर होता है।
कहानी में पात्रों के चरित्र-चित्रण का सबसे अधिक प्रभावशाली तरीका कौन सा है? उदाहरण सहित लिखिए।
कहानी में पात्रों के चरित्र-चित्रण का सबसे प्रभावशाली तरीका होता है — उन्हें उनके कर्मों, संवादों और प्रतिक्रियाओं के माध्यम से पाठकों के सामने प्रस्तुत करना।
किसी पात्र के बारे में केवल बताना नहीं, बल्कि कहानी की घटनाओं में उसकी भूमिका को दिखाना अधिक प्रभावशाली होता है।
उदाहरणतः प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ में हामिद का चरित्र उसकी दादी के लिए चिमटा खरीदने के निर्णय से स्पष्ट होता है।
यह एक क्रियात्मक और भावनात्मक चित्रण है, जहाँ पाठक स्वयं पात्र को समझता है।
इस विधा से पाठक पात्र के व्यवहार, सोच और मूल्यों को गहराई से महसूस करता है — यह प्रभाव बहुत अधिक होता है।
Quick Tip: “बताओ मत — दिखाओ” का सिद्धांत रचनात्मक लेखन में विशेष रूप से चरित्र चित्रण में अपनाया जाता है।
पत्रकारिता की भाषा में मुखड़ा किसे कहते हैं? इसका क्या महत्त्व है? (शब्द सीमा — लगभग 20 शब्द)
पत्रकारिता में समाचार की शुरुआत में आने वाला संक्षिप्त भाग जिसे समाचार का सार कहा जा सके, उसे ‘मुखड़ा’ कहा जाता है।
यह समाचार की सबसे महत्वपूर्ण बातों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।
मुखड़े का उद्देश्य पाठक का ध्यान खींचना और उसे पूरी खबर पढ़ने के लिए प्रेरित करना होता है।
यह मुख्य रूप से 5Ws और 1H (Who, What, When, Where, Why, How) में से आवश्यक तथ्यों को शामिल करता है।
एक अच्छा मुखड़ा समाचार को सशक्त बनाता है और उसकी विश्वसनीयता को स्थापित करता है।
Quick Tip: मुखड़ा ऐसा होना चाहिए जो खबर के पूरे स्वरूप को एक ही झलक में प्रस्तुत कर दे — स्पष्ट, सटीक और रोचक।
“जनसंचार के माध्यम आपस में प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी हैं” — सिद्ध कीजिए। (शब्द सीमा — लगभग 40 शब्द)
वर्तमान समय में जनसंचार के विविध माध्यम — जैसे अखबार, रेडियो, टीवी और सोशल मीडिया — एक-दूसरे के सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं।
अखबार में छपी खबर टीवी पर विस्तारित होती है, और फिर सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो जाती है।
रेडियो उन्हीं खबरों को सुनने योग्य बनाता है और विस्तृत इंटरव्यू प्रसारित करता है।
ये सभी माध्यम एक-दूसरे की सीमाओं की पूर्ति करते हैं और मिलकर व्यापक जनजागरण में सहायक बनते हैं।
अतः इन्हें प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि संवादात्मक पूरक कहा जा सकता है।
Quick Tip: संचार माध्यमों की भूमिका को अलग-अलग प्लेटफॉर्म की विशेषताओं के साथ जोड़कर लिखें — इससे उत्तर व्यावहारिक बनता है।
बीट किसे कहते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (शब्द सीमा — लगभग 40 शब्द)
पत्रकारिता में ‘बीट’ से तात्पर्य है — किसी विशेष क्षेत्र या विषय की नियमित रिपोर्टिंग।
हर पत्रकार को एक निश्चित बीट दी जाती है — जैसे शिक्षा, अपराध, राजनीति, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि।
उदाहरणतः शिक्षा बीट में स्कूल, परीक्षा, परिणाम और नीतियों की खबरें शामिल होती हैं।
बीट रिपोर्टिंग से पत्रकार उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनता है और उसकी रिपोर्टिंग अधिक गहराई और तथ्यपरक होती है।
बीट पत्रकारिता से समाचार की गुणवत्ता और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण में वृद्धि होती है।
Quick Tip: बीट का चयन उस पत्रकार की रुचि और विशेषज्ञता के अनुसार होता है — उदाहरण अवश्य दें।
समाचार पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों और क्षेत्रों से संबंधित जानकारी को क्यों शामिल किया जाता है? स्पष्ट कीजिए।
समाचार पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं बल्कि पाठकों को विविध विषयों से जोड़ना होता है।
विज्ञान, राजनीति, खेल, संस्कृति, मनोरंजन, अर्थशास्त्र जैसे विभिन्न क्षेत्र जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़े होते हैं।
इनकी जानकारी देना पाठकों की समझ, रुचि और जागरूकता को बढ़ाता है।
इससे पाठकों को सम्पूर्ण और संतुलित दृष्टिकोण मिलता है जो लोकतंत्र और सामाजिक संवाद के लिए आवश्यक है।
इसलिए विविध विषयों की सामग्री समाचार माध्यमों का अभिन्न अंग होती है।
Quick Tip: पत्र-पत्रिकाएँ समाज का दर्पण होती हैं — विविध विषयों की प्रस्तुति से वे पाठक के ज्ञान-संसार को समृद्ध करती हैं।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों की तुलना में मुद्रित माध्यम के पाठकों को कौन-कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध हैं?
मुद्रित माध्यम जैसे अखबार और पत्रिकाएँ पाठकों को समाचार पढ़ने की स्वतंत्रता, समय का चयन और गहराई से अध्ययन की सुविधा देते हैं।
पाठक किसी भी समाचार को बार-बार पढ़ सकते हैं, विश्लेषण कर सकते हैं और उसे सहेजकर रख सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, मुद्रित माध्यम बिना किसी तकनीकी बाधा के उपलब्ध रहते हैं और इंटरनेट या बिजली पर निर्भर नहीं होते।
ये आत्मनिर्भर, शांति से पठन योग्य और अध्ययन पर केंद्रित माध्यम होते हैं।
Quick Tip: मुद्रित माध्यम स्थायित्व, विश्वसनीयता और पुनरावलोकन की दृष्टि से आज भी श्रेष्ठ माने जाते हैं।
‘खोजी रिपोर्ट’ और ‘इन डेpth रिपोर्ट’ के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
‘खोजी रिपोर्ट’ (Investigative Report) किसी छिपी हुई सच्चाई, भ्रष्टाचार या षड्यंत्र को उजागर करने वाली रिपोर्ट होती है।
यह रिपोर्ट पत्रकार द्वारा गहन जांच, गुप्त स्रोतों और दस्तावेज़ों की सहायता से तैयार की जाती है।
वहीं ‘इन डेpth रिपोर्ट’ किसी ज्ञात विषय पर गहराई से विश्लेषण प्रस्तुत करती है — इसका उद्देश्य होता है किसी विषय के सभी पक्षों को विस्तार से समझाना।
अतः खोजी रिपोर्ट रहस्योद्घाटन प्रधान होती है जबकि इन डेpth रिपोर्ट व्याख्यात्मक और विस्तृत होती है।
Quick Tip: खोजी रिपोर्ट 'नया उजागर' करती है, जबकि इन डेpth रिपोर्ट 'ज्ञात का विस्तार' करती है — यह मूलभूत अंतर याद रखें।
“मैंने निज दुर्बल पद-बल, उससे हारी होड़ लगाई” ‘देवसेना का गीत’ से उद्धृत इस पंक्ति से आपको क्या प्रेरणा मिलती है?
यह पंक्ति हमें साहस, आत्मबल और संघर्ष की प्रेरणा देती है।
कवि स्वीकार करता है कि उसका शरीर दुर्बल है, उसके पास शक्ति नहीं है, फिर भी वह उस विराट शक्ति से होड़ लगाता है जिससे पहले ही हार सुनिश्चित है।
यह दर्शाता है कि हार-जीत से अधिक महत्वपूर्ण है प्रयास और आत्मविश्वास।
जब कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को जानते हुए भी लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है, तभी उसमें सच्चा पराक्रम प्रकट होता है।
यह पंक्ति यह सिखाती है कि पराजय की आशंका के बावजूद भी संघर्ष करना ही जीवन का वास्तविक साहस है।
Quick Tip: यहाँ प्रेरणा आत्मबल और प्रयास से जुड़ी है — हार की संभावना के बावजूद कोशिश करते रहना ही विजयी भावना की पहचान है।
“इसी तरह भरता और खाली होता है यह शहर” पंक्ति के संदर्भ में बनारस शहर के ‘भरने’ और ‘खाली’ होने से क्या अभिप्राय है?
यह पंक्ति बनारस शहर की सांस्कृतिक चक्रवृत्ति और जीवन की गतिशीलता को दर्शाती है।
‘भरना’ संकेत करता है तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, श्रद्धालुओं और विद्यार्थियों के आगमन की ओर, जो इसे जीवंत और गतिशील बनाते हैं।
‘खाली होना’ दर्शाता है कि समय के साथ वे लौट जाते हैं, और शहर फिर प्रतीक्षारत हो जाता है — पुनः भरने के लिए।
यह जीवन के चक्र जैसा है — आगमन और प्रस्थान, जन्म और मृत्यु, मिलन और वियोग।
बनारस एक ऐसा शहर है जो हर बार रिक्त होकर भी नई ऊर्जा से भरता है — यही उसकी निरंतरता और परंपरा है।
Quick Tip: ‘भरने’ और ‘खाली’ होने का तात्पर्य शाश्वत प्रवाह और सांस्कृतिक पुनरावृत्ति से है — यह उत्तर में अवश्य उभरना चाहिए।
‘तोड़ो’ कविता का कवि क्या तोड़ने की बात करता है और क्यों?
‘तोड़ो’ कविता में कवि रूढ़ियों, अंधविश्वासों, अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं और मानसिक जड़ताओं को तोड़ने की बात करता है।
कवि आह्वान करता है कि समाज में जो भी परंपराएँ व्यक्ति की स्वतंत्रता, विवेक और आत्मसम्मान के विरुद्ध हैं, उन्हें तोड़ना चाहिए।
यह ‘तोड़ना’ केवल विनाश का नहीं, बल्कि नवनिर्माण का प्रतीक है।
कवि युवाओं से कहता है कि वे साहस करें, सोचें, सवाल करें और वह सब तोड़ें जो उन्हें आत्मविकास से रोकता है।
यह कविता परिवर्तन की चेतना और सामाजिक जागरण का सशक्त संदेश देती है।
Quick Tip: यहाँ ‘तोड़ने’ का अर्थ नकारात्मक नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की सकारात्मक पहल से है — उत्तर में यही दृष्टिकोण रखें।
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
पूस जाड़ थरथर तन काँपा~। सूरज जराइ लंक दिसि तापा~॥
बिरह बाड़ि भा दारुन सीउ~। काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ~॥
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे~। पंथ अपार सूझ नहीं नियरे~॥
सौर सुपीति आवे जुड़ी~। जानहूँ सेज हिंगांचल बूड़ी~॥
सन्दर्भ:
यह पद्यांश किसी संत या भक्त कवि द्वारा रचित वह वर्णनात्मक दृश्य है जिसमें अत्यंत कठोर ऋतु और कठिन मार्ग की प्रतीकात्मक चर्चा हो रही है। यह पद आत्मा की ईश्वर-प्राप्ति की यात्रा को दर्शाता है।
प्रसंग:
यहाँ कवि मनुष्य जीवन के मार्ग को कठिन और तापपूर्ण बताते हुए ईश्वर की प्राप्ति हेतु आवश्यक तप, सहनशीलता और धैर्य का चित्रण करता है।
व्याख्या:
कवि कहता है कि पूस की सर्दी में शरीर काँप रहा है, सूरज की तपिश तक ठंडी लगती है।
विरह के कारण मन भी काँप रहा है और आत्मा थरथरा रही है — जैसे ईश्वर से दूर होने का दुःख जीवन को कंपा देता है।
हृदय में काँटे चुभ रहे हैं, राह कठिन और अस्पष्ट है, कोई मार्गदर्शन नहीं है।
सच्चा पथिक वही है जो ऐसी ठंडी रातों में हिमाचल की ओर तीव्र गति से प्रस्थान करता है, जहाँ उसे सत्य की सेज प्राप्त होगी।
यह यात्रा प्रतीक है आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर के मिलन की, जो त्याग, प्रेम और तप से संभव होती है।
निष्कर्ष:
यह काव्यांश आध्यात्मिक साधना के मार्ग की कठिनाइयों को दर्शाता है, जहाँ विरह, तपस्या, और आत्मबल की आवश्यकता है। यह भक्तिकाल की तपश्चर्या और प्रेम का सुंदर चित्रण है।
Quick Tip: ‘सर्दी’, ‘काँपना’, ‘काँटे’, ‘हिमांचल’ जैसे प्रतीक गहन आध्यात्मिक अर्थ देते हैं — इन्हें केवल प्रकृति वर्णन न मानें।
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
यह मधु है -- स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गौरस -- जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर -- फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो~।
यह दीप अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो~।
सन्दर्भ:
यह अज्ञेय की कविता ‘यह दीप अकेला’ से लिया गया एक पद्यांश है जिसमें कवि रचनाशीलता, प्रकृति और आत्मबल के माध्यम से जीवन की शक्ति को पुनः पहचानने की बात करता है।
प्रसंग:
कवि अपने काव्य-दीप के माध्यम से उस सर्जनात्मक सामर्थ्य का चित्रण कर रहा है जिसे अक्सर समाज नज़रअंदाज़ कर देता है। वह चाहता है कि इस एकाकी दीप को भी उचित मान्यता मिले।
व्याख्या:
कवि कहता है — यह ‘मधु’ (रस/प्रेम/चेतना) स्वयं समय की गहनता में पकाया गया है। यह ‘गौरस’ जीवन की गहराइयों से निकला अमृत है।
यह ‘अंकुर’ — धरती की गहराई से फूटा एक नवीन जीवन है जो अपने भीतर रचनात्मक ऊर्जा लिए है।
यह प्रकृति, ब्रह्म, समय और चेतना का संगम है — इसे भी शक्ति दी जाए ताकि यह दीप बुझने न पाए।
यह दीप अकेला है, पर स्नेह से भरा हुआ है। यह समाज के गर्व, अहंकार और उदासीनता के बीच एक आशा की लौ है।
निष्कर्ष:
कवि यहाँ आत्म-अभिव्यक्ति के अधिकार की माँग करता है। यह पद्यांश रचनाकार की निजता, संघर्ष, और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक बनकर उभरता है।
Quick Tip: “यह मधु है...” — जैसे प्रतीकों में आत्मा और सृजन की गहराई छिपी है — उत्तर में उनका भावार्थ स्पष्ट करें।
‘कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंग’ पंक्ति के माध्यम से राम के प्रति भरत के किस विश्वास का परिचय मिलता है?
(I) राम उनके आग्रह पर अयोध्या लौट चलेंगे।
(II) राम भरत से बहुत प्रेम करते हैं।
(III) राम उनका मन नहीं तोड़ेंगे।
(IV) राम उन्हें क्षमा कर देंगे।
‘कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंग’ — इस पंक्ति में भरत की राम पर गहन श्रद्धा और विश्वास झलकता है।
भरत को यह पूर्ण विश्वास है कि राम उनके आग्रह को टालेंगे नहीं।
वे मानते हैं कि राम कभी उनका मन नहीं तोड़ते, और यदि वे मन से विनती करेंगे, तो राम अवश्य अयोध्या लौटेंगे।
इस विश्वास से यह संकेत मिलता है कि भरत के लिए राम केवल भाई ही नहीं, बल्कि आदर्श भी हैं, जो सदा उनकी भावना का आदर करते हैं।
इस प्रकार (I) “राम उनके आग्रह पर अयोध्या लौट चलेंगे” और (III) “राम उनका मन नहीं तोड़ेंगे” — दोनों कथन उपयुक्त हैं।
Quick Tip: पद्यांश का भावार्थ केवल शाब्दिक नहीं, आत्मीय होना चाहिए — तभी सही विकल्प चुना जा सकता है।
राम की किस प्रकृति का वर्णन यहाँ किया गया है?
पद्यांश की पंक्तियों में “मैं प्रभु कृपा भीख जोंही” और “त्रिलोकनाथ अति कृपालु” जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है।
इन पंक्तियों में कवि भरत यह संकेत करते हैं कि राम परम कृपालु हैं, जो सभी पर कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं।
यह ‘कृपापूर्ण’ स्वभाव उनके चरित्र की विशेषता है — वे करुणा और भक्ति से भरकर भक्तों की प्रार्थना स्वीकार करते हैं।
भरत को आशा है कि प्रभु उनकी भी प्रार्थना स्वीकार करेंगे, क्योंकि वे कृपा के सागर हैं।
इसलिए विकल्प (A) “कृपापूर्ण” राम की प्रकृति का सबसे उपयुक्त वर्णन है।
Quick Tip: जब किसी पात्र की विशेषता पूछी जाए, तो मूल शब्दों और विशेषणों पर ध्यान दें — जैसे “कृपा”, “भीख”, “कृपालु”।
निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा उत्तर के लिए सही विकल्प का चयन कीजिए:
कथन: भरत ने राम के समक्ष कभी मुँह नहीं खोला।
कारण: शिष्टाचार की परंपरा रही है कि बड़ों के सामने विनम्रता का व्यवहार किया जाता है।
कथन सही है क्योंकि तुलसीदासजी के अनुसार भरत अत्यंत विनयी, मर्यादित और संयमी चरित्र हैं।
उन्होंने राम के समक्ष कभी अनुचित ढंग से अपनी बात नहीं रखी और सदा मर्यादा का पालन किया।
कारण भी उचित है — भारतीय संस्कृति में बड़ों के सामने शांत, शालीन और नम्र व्यवहार की परंपरा रही है।
भरत के व्यवहार में यह शिष्टाचार पूरी तरह परिलक्षित होता है।
इसलिए दोनों कथन और कारण सही हैं तथा कारण, कथन की उपयुक्त व्याख्या करता है।
Quick Tip: ‘कथन-कारण’ आधारित प्रश्नों में यह अवश्य देखें कि क्या कारण वास्तव में कथन को स्पष्ट करता है या केवल संबंधित लगता है।
भरत ने राम के स्वभाव की किस विशेषता का उल्लेख किया है?
पद्यांश में भरत राम के उस स्वभाव का वर्णन करते हैं जिसमें वे अत्यंत शांत, संयमी और क्षमाशील हैं।
भरत कहते हैं कि राम तो ऐसे हैं कि वे अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते, और किसी का भी अपकार नहीं सोचते।
उनका यह भाव उनके ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप को प्रमाणित करता है।
यह विशेषता केवल उदारता नहीं बल्कि पूर्ण आत्मसंयम और क्षमा के आदर्श को दर्शाती है।
इसलिए विकल्प (C) “अपराधी पर भी क्रोध न करने की” सबसे उपयुक्त है।
Quick Tip: जब स्वभाव की विशेषता पूछी जाए, तो पात्र की सबसे विशिष्ट और चरम प्रतिक्रिया पर ध्यान दें — जैसे राम की क्रोधहीनता।
‘पुलकि सरीर सभाँ भए ठाड़े’ — पंक्ति के माध्यम से किसकी मनोदशा का वर्णन किया गया है?
‘पुलकि सरीर सभाँ भए ठाड़े’ — इस पंक्ति में “पुलकित शरीर” और “स्तब्ध खड़े रह जाना” जैसे भावों से भरत की मनोदशा को चित्रित किया गया है।
भरत राम के दर्शन से अत्यंत भावविभोर हो जाते हैं।
वे इतने अधिक भावुक और श्रद्धावान हो जाते हैं कि उनका शरीर रोमांचित हो उठता है और वे अवाक् होकर खड़े रह जाते हैं।
यह चित्रण केवल भौतिक स्थिति नहीं, बल्कि भरत की आत्मिक भक्ति और राम के प्रति अटूट प्रेम को दर्शाता है।
इसलिए सही उत्तर है — (A) भरत।
Quick Tip: पद में प्रयुक्त क्रियाओं (जैसे “पुलकि”, “सभाँ भए ठाड़े”) के आधार पर पात्र की पहचान करें — ये मनोदशा के संकेत होते हैं।
हरगोबिन को अचरज हुआ -- तो आज भी किसी को संदेसिया की ज़रूरत पड़ सकती है~।
इस ज़माने में जबकि गाँव-गाँव में डाकघर खुल गए हैं, संदेसिया के मार्फत संवाद क्यों भेजेगा कोई~?
आज तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहाँ का कुशल संवाद माँग सकता है~।
फिर उसकी बुलाहट क्यों हुई~?
\medskip
हरगोबिन बड़ी हवेली की टूटी झरोखी पारकर अंदर गया~।
सदा की भाँति उसने वातावरण को सूँघकर संवाद का अंदाज़ लगाया~।
\dotfill निश्चित ही कोई गुप्त समाचार ले जाना है~।
चाँद-सूरज को भी नहीं मालूम हो~।
पेवो-पंछी तक न जाने~।
\medskip
“पाँव लागी, बड़ी बहुरिया~!”
\medskip
बड़ी हवेली की बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन को पीढ़ी दी और आँख के इशारे से कुछ देर चुपचाप बैठने को कहा~।
बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है~।
जहाँ दिनभर नौकर-नौकरानियाँ और जन-मज़दूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ से सूखा में अनाज लेकर फटक रही है~।
सन्दर्भ:
यह गद्यांश एक ऐसे ग्रामीण परिवेश से जुड़ा हुआ है जहाँ आधुनिकता के प्रभाव से पुरानी सामाजिक व्यवस्थाएँ लुप्तप्राय हो चुकी हैं। लेखक यहाँ तकनीकी प्रगति के बावजूद मानवीय संबंधों की संवेदनशीलता और पुराने जमाने की आत्मीयता को रेखांकित करता है।
प्रसंग:
हरगोबिन को अचरज तब होता है जब उसे सन्देशवाहक (संवदिया) की आवश्यकता प्रतीत होती है — जबकि वह जानता है कि आज के समय में संदेश भेजने के अनेक साधन उपलब्ध हैं। यह विस्मय उसकी भावनात्मक उलझन और सामाजिक परिवर्तन को दर्शाता है।
व्याख्या:
गद्यांश में ‘संवदिया’ की चर्चा केवल संचार के साधन के रूप में नहीं, बल्कि पुराने संबंधों और पारिवारिक आत्मीयता की प्रतीक के रूप में हुई है।
हरगोबिन आश्चर्यचकित है कि जब आज मोबाइल, टेलीविज़न, इंटरनेट जैसे साधन उपलब्ध हैं, तो फिर किसी को मुख्तारनामा ले जाने वाले संवदिये की क्या आवश्यकता?
वह सोचता है कि अब कोई लंका तक बैठकर संवाद भेज सकता है — फिर उसे क्यों बुलाया गया?
इसके बाद का दृश्य बदलते समय और सामंती व्यवस्था के पतन को दिखाता है — बड़ी हवेली की टूटी दहलीज़, वीरान चौबारा, और बड़ी बुढ़िया का अकेलापन — सब मिलकर सामाजिक बदलाव और विघटन को प्रकट करते हैं।
जहाँ कभी चहल-पहल थी, वहीं अब सन्नाटा है। यह स्थिति केवल हवेली की नहीं, पूरे समाज के संक्रमण की प्रतीक है।
निष्कर्ष:
यह गद्यांश परंपरा और आधुनिकता के टकराव, सामंती समाज के पतन, और संवादहीन होते संबंधों की व्यथा को उजागर करता है। संवदिया यहाँ केवल व्यक्ति नहीं, एक संवेदनशील युग का प्रतीक बनकर आता है।
Quick Tip: “संवदिया” का प्रयोग प्रतीकात्मक है — वह केवल संवाद का माध्यम नहीं, एक लुप्त होती आत्मीय संस्कृति का प्रतिनिधि है।
कहीं-कहीं अज्ञात नाम-गोत्र झाड़-झंखाड़ और बेहया-से पेड़ खड़े अवश्य दिख जाते हैं पर और कोई हरियाली नहीं~।
दूर तक सूख गई है~। काली-काली चट्टानों और बीच-बीच में शुष्कता की अंतरिक्षध सत्ता का इज़हार करने वाली रक्तिमा देती~!
रस कहाँ है~? ये जो ठिगने से लेकिन शानदार दरख़्त गर्मी की भयंकर मार खा-खाकर और भूख-प्यास की निरंतर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं,
इन्हें क्या कहूँ~? सिर्फ़ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं~। बेहया हैं क्या~? या मस्तमोला हैं~?
कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी, पैठी रहती हैं~।
ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गहराव से अपना भोग्य खींच लाते हैं~।
सन्दर्भ:
यह गद्यांश प्रकृति के माध्यम से मनुष्यता की गहराई, पीड़ा और सहनशीलता को प्रकट करता है। लेखक यहाँ उजाड़ भू-दृश्य की सहायता से उन लोगों की स्थिति को उजागर करता है जो समाज में उपेक्षित, खामोश और संघर्षरत रहते हैं।
प्रसंग:
लेखक एक सूखी, वीरान भूमि का चित्र प्रस्तुत करता है जहाँ बेशाया (झाड़-झंखाड़) पेड़ खड़े हैं। इन्हें देखकर लगता है जैसे ये प्रकृति के कोप और अभाव को सहने वाले साक्षी हों। यह प्राकृतिक दृश्य दरअसल सामाजिक-मानविक जीवन का रूपक है।
व्याख्या:
लेखक कहता है — ये पेड़ अपनी जगह खड़े तो हैं, पर उनमें हरियाली नहीं है। भूमि सूखी है, चारों ओर केवल काली चट्टानें और मरुभूमि जैसी नीरसता है।
बीच-बीच में कुछ लालिमा (शुक्लता की अंतःरस धारा) है जो संघर्ष और रक्तपात की ओर संकेत करती है।
यह स्थान कभी गरम, कभी ठंडा होता है — कभी निष्क्रियता तो कभी हिंस्रता का प्रतीक बन जाता है।
इन पेड़ों की हालत वैसी ही है जैसे समाज के वे लोग जो बाहर से कठोर, रूखे और बेजान लगते हैं — पर भीतर ही भीतर पीड़ा, भूख, अपमान और संघर्ष की आग से जूझते रहते हैं।
कवि पूछता है — ये हँसते भी हैं, रोते भी हैं — ये बहते हैं क्या? ये मस्तमौला हैं क्या?
दरअसल, यह व्यंग्यात्मक शैली में लेखक का गहन यथार्थबोध है — कि समाज के निचले स्तर के लोग, जो हमें कुछ नहीं कहते दिखते हैं, वे भी अपने भीतर कई भूगर्भीय पीड़ा समेटे होते हैं।
इनकी चुप्पी, इनकी जड़ें बहुत गहराई तक फैली होती हैं — और ये अनजानी पीड़ा की छाती पर खड़े हो कर जीवन की ललक बनाए रखते हैं।
निष्कर्ष:
यह गद्यांश सामाजिक यथार्थ, मनुष्य की भीतरी पीड़ा और अस्तित्व के संघर्ष को अत्यंत प्रतीकात्मक और भावात्मक शैली में प्रस्तुत करता है। लेखक का संकेत स्पष्ट है — सतह पर जो निष्क्रिय या बेमायने दिखता है, उसके भीतर भी जीवन, दर्द और ऊर्जा छिपी होती है।
Quick Tip: इस गद्यांश में प्रकृति का उपयोग रूपक (allegory) के रूप में किया गया है — सामाजिक जीवन की गहराई को समझने के लिए ‘बाहर से बेजान, भीतर से जीवित’ भावना पर ध्यान दें।
लेखक के पिता की किसमें रुचि थी?
पाठ में यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि लेखक के पिता को हिंदी और फ़ारसी की उक्ति-शैली को मिलाकर बोलने में विशेष आनंद आता था।
वे दोनों भाषाओं की अभिव्यक्तियों, मुहावरों और कहावतों को मिलाकर एक विशेष प्रकार की भाषिक शैली में संवाद करते थे।
यह उनकी भाषाई सौंदर्य-बोध और सांस्कृतिक समन्वय की रुचि को दर्शाता है।
इसलिए सबसे उपयुक्त उत्तर है — (D) हिंदी-फ़ारसी भाषा की उक्तियाँ मिलाने में।
Quick Tip: ऐसे प्रश्नों में पाठ के वर्णनात्मक अंशों को ध्यान से पढ़ें — विशेष रूप से पात्र की आदत, व्यवहार या भाषा शैली से संबंधित।
गद्यांश में रामचरितमानस और रामचंद्रिका का उल्लेख क्यों किया गया है?
पाठ में लेखक ने अपने पारिवारिक वातावरण का उल्लेख करते हुए रामचरितमानस और रामचंद्रिका जैसे ग्रंथों का विशेष रूप से उल्लेख किया है।
ये दोनों ग्रंथ उस समय न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टि से भी घर-घर में पढ़े और सुने जाते थे।
इन ग्रंथों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि लेखक का पारिवारिक वातावरण धार्मिक ही नहीं, बल्कि साहित्यिक रुचियों से भी परिपूर्ण था।
पिता द्वारा इन ग्रंथों का अध्ययन और उनके भावों की प्रस्तुति, इस साहित्यिक वातावरण को और भी जीवंत बनाती है।
अतः सही उत्तर है — (D) घर के साहित्यिक परिवेश से परिपूर्ण वातावरण का उल्लेख करने के लिए।
Quick Tip: जब दो ग्रंथों का विशेष रूप से उल्लेख हो, तो यह देखें कि उनका प्रयोजन धार्मिक है या साहित्यिक वातावरण चित्रित करना — संदर्भ महत्वपूर्ण है।
लेखक के मन में भारतेन्दु के संबंध में मधुर भावना जागने का कारण था –
लेखक के हृदय में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रति जो विशेष स्नेह और श्रद्धा उत्पन्न हुई, उसका प्रमुख कारण था—
उनके पिता द्वारा भारतेन्दु के नाटकों का भावपूर्ण एवं चिताकर्षक ढंग से पाठ करना।
लेखक बचपन में जब अपने पिता से इन नाटकों को सुनते थे, तो वे पात्र और घटनाएँ उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती थीं।
इस प्रक्रिया ने लेखक की भावनाओं में भारतेन्दु के प्रति मधुर भावना और गहरी आत्मीयता उत्पन्न की।
यह स्पष्ट करता है कि साहित्यिक अभिरुचि का विकास बाल्यकाल में पारिवारिक वातावरण द्वारा होता है।
लेखक ने स्वयं बताया है कि पिता की वाणी और उनका भाव प्रदर्शन नाटकों को जीवंत बना देता था,
जिससे लेखक का मन भारतेन्दु की रचनात्मकता की ओर खिंचता चला गया।
Quick Tip: लेखक के बचपन की घटनाओं और पारिवारिक प्रभावों को समझना साहित्यिक रुचियों के विकास को जानने का सशक्त माध्यम है।
गद्यांश में प्रयुक्त ‘अवस्था’ शब्द का अर्थ है –
‘अवस्था’ शब्द का अर्थ गद्यांश में उस स्थिति को दर्शाने के लिए किया गया है, जहाँ किसी व्यक्ति की उम्र या जीवन काल को इंगित किया गया है। यह शब्द कई संदर्भों में प्रयुक्त हो सकता है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ स्पष्ट रूप से ‘आयु’ है, जो जीवन की अवस्था को सूचित करता है। इसलिए सही उत्तर है — (C) आयु।
Quick Tip: प्रश्न में प्रयुक्त शब्द का सही अर्थ समझने के लिए उसका संदर्भ अवश्य देखें। 'अवस्था' जैसे शब्द विभिन्न संदर्भों में भिन्न अर्थ दे सकते हैं।
निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उचित विकल्प का चयन कर लिखिए :
कथन: बचपन में लेखक राजा हरिश्चंद्र और कवि हरिश्चंद्र में कोई अंतर नहीं कर पाता था।
कारण: लेखक की बाल–बुद्धि नाम की समानता के कारण दोनों को एक ही समझती थी।
इस प्रश्न में लेखक के बचपन की सोच और तर्क को दर्शाया गया है। लेखक बचपन में राजा हरिश्चंद्र और कवि हरिश्चंद्र को एक ही समझता था क्योंकि नाम समान थे।
बाल्यावस्था में तर्कशीलता की जगह नाम जैसी चीजों से पहचान बनाई जाती है।
इसलिए कथन सही है और उसका कारण भी पूरी तरह उपयुक्त है।
कारण स्पष्ट रूप से कथन की व्याख्या करता है, जिससे यह उत्तर सबसे उचित बनता है।
Quick Tip: 'कथन और कारण' आधारित प्रश्नों में दोनों वाक्यों को स्वतंत्र और फिर संयुक्त रूप से जांचें — तभी सही उत्तर सुनिश्चित किया जा सकता है।
‘हिंदी भाषा एवं साहित्य के प्रति शुक्ल जी का रुझान बाल्यकाल से था।’ ‘प्रेमचन्द की छाया स्मृति’ पाठ के आधार पर पुष्टि कीजिए।
‘प्रेमचंद की छाया स्मृति’ पाठ में शुक्ल जी के साहित्यिक संस्कारों की झलक उनके बाल्यकाल से ही स्पष्ट हो जाती है।
लेखक बताता है कि शुक्ल जी बाल्यावस्था से ही हिंदी भाषा में गहरी रुचि रखते थे।
जब वह केवल तेरह वर्ष के थे, तब उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का अध्ययन करना प्रारंभ किया था।
उन्होंने प्रेमचंद की भाषा, शैली और विचारों को आत्मसात किया — इसीलिए वे उनकी ‘छाया’ में पले।
बिना किसी औपचारिक मार्गदर्शन के ही उन्होंने साहित्य की धारा में प्रवेश किया और शुद्ध भाषा के प्रति सजग हो गए थे।
Quick Tip: प्रश्न “पुष्टि कीजिए” है — इसलिए पाठ से सटीक प्रमाण अवश्य दें जैसे ‘तेरह वर्ष की अवस्था में रंगभूमि पढ़ना’।
हरगोबिन का काम ही था संवाद पहुँचाना, फिर भी उसके कदम बड़ी बहुरिया के मैके की ओर क्यों नहीं बढ़ रहे थे? ‘संवदिया’ पाठ के सन्दर्भ में लिखिए।
‘संवदिया’ पाठ में हरगोबिन पेशे से एक संवदिया (संदेश पहुँचाने वाला) है, लेकिन जब उसे बड़ी बहुरिया के मैके संदेश लेकर जाना होता है, तो वह दुविधा में पड़ जाता है।
वह जानता है कि अब दुनिया बदल चुकी है — अब मोबाइल और इंटरनेट जैसे साधनों से संवाद भेजे जा सकते हैं।
उसे लगता है कि एक संवदिया की आवश्यकता अब क्यों आन पड़ी?
इसके अतिरिक्त, बड़ी हवेली की वीरानी, टूटे संबंध, और समय का बदलाव उसे मानसिक रूप से भी रोक रहा था।
हरगोबिन के पैर इसलिए नहीं बढ़ पा रहे थे क्योंकि संवाद का रूप बदल चुका था — और हवेली का गौरवशाली अतीत केवल स्मृति बन चुका था।
Quick Tip: यह उत्तर केवल बाहरी कारणों पर नहीं — भीतरी मानसिक दुविधा और सामाजिक परिवर्तन पर भी केंद्रित हो।
‘जहाँ कोई वापसी नहीं’ पाठ में लेखक ने धान के खेतों में काम करने वाली औरतों की तुलना किनके साथ की है? स्पष्ट करते हुए दोनों के बीच का अंतर लिखिए।
‘जहाँ कोई वापसी नहीं’ पाठ में लेखक ने धान के खेतों में काम करने वाली स्त्रियों की तुलना “पत्थर तोड़ने वाली मजदूरिनों” से की है।
लेखक के अनुसार, धान रोपने वाली स्त्रियाँ बाहर से मुँह छिपाए, पानी में कमर तक डूबी हुई, निरंतर झुकी हुई होती हैं।
वे चुपचाप काम करती हैं — उनका श्रम धीमा, गहन और दीर्घकालीन होता है।
इसके विपरीत, पत्थर तोड़ने वाली मजदूरिनों का श्रम खुला, ऊर्जावान, और गतिशील होता है — जिसमें चोट और आवाज दोनों होती है।
लेखक यह अंतर दिखाता है कि खेत में काम करने वाली स्त्रियाँ दिखती कम हैं, पर उनका योगदान उतना ही अथवा उससे अधिक महत्वपूर्ण है।
Quick Tip: उत्तर में तुलनात्मक स्वर स्पष्ट रखें — “खामोश श्रम” बनाम “प्रकट श्रम” — यही लेखक का भाव है।
‘अब भैंसों के घर न जाऊँगी, अलग रहूँगी और मेहनत मजूरी करके जीवन का निर्वाह करूँगी।’ कथन के सन्दर्भ में सुभागी के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
यह कथन ‘सुभागी’ के स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और संघर्षशील व्यक्तित्व को दर्शाता है।
वह सामाजिक बंधनों से निकलकर एक स्वतंत्र स्त्री के रूप में जीवन जीने का निश्चय करती है।
सुभागी को जब अपमान और अन्याय का सामना करना पड़ता है, तब वह समझौतावादी रवैया नहीं अपनाती, बल्कि साहसपूर्वक अलग रहने और परिश्रम करके जीवन यापन का निर्णय लेती है।
उसका यह आत्मनिर्णय बताता है कि वह आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता को अत्यंत महत्व देती है।
सुभागी जैसी स्त्रियाँ समाज में बदलाव की प्रेरणा बनती हैं, जो दबी-कुचली व्यवस्था के विरुद्ध खड़ी होती हैं।
Quick Tip: सुभागी का चरित्र आत्मसम्मान, निर्णय-क्षमता और संघर्षशीलता का प्रतीक है — उत्तर में इन विशेषताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करें।
‘डगा-डगा रोटी पग-पग नीर’ वाले मालवा की वर्तमान स्थिति ‘अपना मालवा खाऊ-उजाऊ सभ्यता में’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। स्थिति के कारणों को स्पष्ट करते हुए यह भी लिखिए कि इसे कैसे सुधारा जा सकता है?
मालवा क्षेत्र, जो कभी हरियाली और जलसंपन्नता के लिए प्रसिद्ध था — आज उजाड़, सूखा और पलायन की त्रासदी का प्रतीक बन चुका है।
“डगा-डगा रोटी पग-पग नीर” जैसे कहावत अब केवल स्मृति बनकर रह गई है।
पाठ में बताया गया है कि अंधाधुंध जल दोहन, बोरिंग, रासायनिक खादों का प्रयोग और पारंपरिक कृषि-व्यवस्था का ह्रास इसके प्रमुख कारण हैं।
वनों की अंधाधुंध कटाई और वर्षा के असमान वितरण ने भी स्थिति को और बिगाड़ा है।
पुनर्स्थापन के लिए जल संरक्षण, पारंपरिक सिंचाई विधियों की वापसी, और जैविक कृषि को अपनाना आवश्यक है।
इसके साथ-साथ ग्रामीण युवाओं को स्थानीय रोजगार से जोड़ना भी ज़रूरी है।
Quick Tip: उत्तर में पहले मालवा की गौरवमयी स्थिति, फिर पतन के कारण और अंत में समाधान — इस क्रम का पालन करें।
‘बिस्कोहर की माटी’ पाठ में वर्णित ग्रामीण जीवन की झाँकी प्रस्तुत कीजिए।
‘बिस्कोहर की माटी’ पाठ में लेखक ने उत्तर प्रदेश के बिस्कोहर गाँव के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी प्रस्तुत की है।
यहाँ के लोग मेहनतकश, स्वाभिमानी और परंपरा से जुड़े हुए हैं। उनका जीवन भले ही साधनहीन हो, लेकिन आत्मगौरव से भरा है।
पाठ में पंडित रामलखन मिश्र जैसे पात्रों के माध्यम से ग्रामीण बौद्धिक चेतना का परिचय मिलता है।
ग्रामीणों के बीच आपसी सहयोग, सामाजिक जीवन की एकता, त्योहारों की सरलता और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव दिखाई देता है।
यह झाँकी दर्शाती है कि भारतीय गाँव केवल कृषि केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार और संस्कृति के जीवित केंद्र होते हैं।
Quick Tip: ग्रामीण जीवन की झाँकी में केवल भौतिक नहीं, भावनात्मक और सांस्कृतिक पक्ष भी समाहित करें।
*The article might have information for the previous academic years, please refer the official website of the exam.