
CBSE Class 12 Hindi Elective Question Paper 2026 with Solutions PDFs is available here for download.CBSE Board Class 12 Hindi Elective Paper 2026 was held on March 16, 2026. CBSE Board Class 12 question paper followed the latest syllabus and exam pattern prescribed by CBSE. CBSE Board Class 12 the examination was held in the first half from 10:30 AM to 1:30 PM. Students can download the official paper in PDF format for reference.
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देवसेना की हार और निराशा के मुख्य कारण क्या थे?
Step 1: Understanding the Concept:
यह प्रश्न जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक 'स्कंदगुप्त' से लिए गए 'देवसेना का गीत' पर आधारित है।
देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है, जिसके जीवन में कई त्रासदियाँ एक साथ घटित होती हैं और वह आजीवन संघर्ष करती है।
Step 2: Detailed Explanation:
देवसेना की हार और निराशा के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
1. पारिवारिक विनाश: हूणों के बर्बर आक्रमण में मालवा राज्य पूरी तरह नष्ट हो गया था।
इस भीषण युद्ध में देवसेना के भाई बंधुवर्मा सहित उसका पूरा परिवार वीरगति को प्राप्त हो गया, जिससे वह नितांत अकेली और बेसहारा हो गई।
2. प्रेम में निराशा (एकतरफा प्रेम): देवसेना अपने यौवन काल में सम्राट स्कंदगुप्त से निश्छल और गहरा प्रेम करती थी, परंतु उस समय स्कंदगुप्त मालवा के धनकुबेर की कन्या 'विजया' की ओर आकर्षित था।
स्कंदगुप्त द्वारा अपना प्रेम ठुकराए जाने पर देवसेना गहरे अवसाद में चली जाती है और आजीवन अविवाहित रहकर राष्ट्रसेवा तथा भिक्षाटन करने का कठिन व्रत ले लेती है।
जीवन के अंतिम पड़ाव में (वृद्धावस्था में) जब स्कंदगुप्त उसके पास अपना प्रणय-निवेदन लेकर आता है, तब तक देवसेना अपने मन की सभी सांसारिक कामनाओं को मार चुकी होती है और उसे ठुकरा देती है।
Step 3: Final Answer:
अतः देवसेना की हार का मुख्य कारण हूणों के आक्रमण में उसके पूरे परिवार का विनाश और स्कंदगुप्त द्वारा उसके पवित्र व एकतरफा प्रेम का ठुकराया जाना था। यही उसकी आजीवन पीड़ा का मूल बना।
Quick Tip: साहित्यिक प्रश्नों के उत्तर लिखते समय चरित्र के मनोवैज्ञानिक द्वंद्व (psychological conflict) को स्पष्ट करना हमेशा अच्छे अंक दिलाता है। देवसेना के चरित्र में 'कर्तव्य' और 'प्रेम' का द्वंद्व प्रमुख है।
निराला ने अपनी पुत्री के विवाह को 'विलक्षण' (अनोखा) क्यों कहा है?
Step 1: Understanding the Concept:
यह प्रश्न सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित प्रसिद्ध शोकगीत 'सरोज स्मृति' से लिया गया है।
इस कविता में कवि ने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज के विवाह की स्मृतियों को अत्यंत मार्मिक ढंग से उकेरा है और उसे सामान्य विवाहों से बिल्कुल अलग बताया है।
Step 2: Detailed Explanation:
सरोज का विवाह भारतीय परंपराओं में होने वाले सामान्य और भव्य विवाहों से बिल्कुल भिन्न अर्थात् 'विलक्षण' था, जिसके निम्नलिखित कारण थे:
1. सादगी और एकांत: इस विवाह में न तो सगे-संबंधियों को आमंत्रित किया गया था और न ही विवाह की कोई आम चहल-पहल या शोर-शराबा था।
2. परंपराओं का अभाव: विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक मंगलगीत भी नहीं गाए गए और न ही महिलाओं द्वारा कोई रतजगा (रात्रि जागरण) किया गया। चारों ओर बस एक गहरी और पवित्र शांति छाई हुई थी।
3. पिता द्वारा माता का दायित्व निभाना: सबसे अनोखी बात यह थी कि विवाह के समय कन्या को जो शिक्षाएँ (कुल-शिक्षा) और विदाई का संदेश एक माँ द्वारा दिया जाता है, वह कर्तव्य निराला जी (पिता) ने स्वयं निभाया क्योंकि सरोज की माता का बहुत पहले ही देहांत हो चुका था।
Step 3: Final Answer:
विवाह की यह अभूतपूर्व सादगी, कोलाहल का अभाव और एक पिता द्वारा माता के कर्तव्यों का निर्वहन ही इस विवाह को पूरी तरह से 'विलक्षण' बनाता है।
Quick Tip: उत्तर में यह अवश्य बताएँ कि 'सरोज स्मृति' हिंदी साहित्य का प्रथम शोकगीत (Elegy) माना जाता है। विवाह की 'मौन शांति' को निराला ने एक पवित्र संगीत के रूप में चित्रित किया है।
राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Step 1: Understanding the Concept:
यह प्रश्न गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के अयोध्या कांड के अंश 'भरत राम का प्रेम' पर आधारित है।
राम के वनवास जाने के पश्चात् भरत उन्हें वापस अयोध्या लौटाने के लिए चित्रकूट जाते हैं, जहाँ उनके प्रेम, भक्ति और ग्लानि की गहराई दृष्टिगोचर होती है।
Step 2: Detailed Explanation:
राम के प्रति भरत के अनन्य प्रेम की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. गहरी आत्मग्लानि (Guilt) और निश्छलता: भरत राम के वनवास के लिए अपनी माता कैकेयी को दोष देने के बजाय स्वयं को और अपने दुर्भाग्य को दोषी मानते हैं।
वे मानते हैं कि उनके अपने पापों के कारण ही यह विपत्ति आई है। यह उनकी निश्छलता और राम के प्रति उनके अगाध प्रेम को दर्शाता है कि वे अपने आराध्य के कष्ट का कारण स्वयं को मानते हैं।
2. राम के स्वभाव की प्रशंसा और अटूट श्रद्धा: भरत चित्रकूट की सभा में कहते हैं कि राम का स्वभाव इतना क्षमाशील और स्नेही है कि उन्होंने आज तक किसी पर क्रोध नहीं किया।
वे बताते हैं कि बचपन के खेलों में भी राम हमेशा हारकर भरत को जिता देते थे, ताकि उनका छोटा भाई निराश न हो ("मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ, अरापहिं पर कोह न काऊ")।
Step 3: Final Answer:
भरत का प्रेम स्वार्थरहित, श्रद्धापूर्ण और आत्मग्लानि से भरा है। बचपन से लेकर अब तक राम के प्रति उनका यह भ्रातृत्व भाव उनके चरित्र की महानता को सिद्ध करता है।
Quick Tip: राम और भरत के बीच के इस प्रेम को 'भ्रातृत्व प्रेम' (Brotherly love) का सबसे उच्च और आदर्श उदाहरण माना जाता है। उत्तर में तुलसीदास जी की पंक्तियों का संदर्भ देना उत्तर को उत्कृष्ट बनाता है।
'बनारस' कविता में शहर की प्राचीनता और आधुनिकता का मिश्रण किस प्रकार दिखाया गया है?
Step 1: Understanding the Concept:
केदारनाथ सिंह द्वारा रचित कविता 'बनारस' में इस ऐतिहासिक शहर की सांस्कृतिक बनावट, उसके जीवन प्रवाह और उसके दोहरे स्वरूप का अद्भुत चित्रण किया गया है।
कवि ने बनारस को समय की दो अलग-अलग धाराओं—प्राचीनता और आधुनिकता—के बीच एक साथ खड़ा दिखाया है।
Step 2: Detailed Explanation:
1. प्राचीनता का स्वरूप: बनारस शहर अपनी प्राचीनता और पौराणिकता के लिए विख्यात है।
कवि बताता है कि इस शहर का जीवन "धीरे-धीरे" चलता है—यहाँ की उड़ती हुई धूल, गंगा की अविरल धारा, घाटों पर निरंतर जलने वाली चिताएँ और मंदिरों में बजने वाली घंटियाँ इसकी प्राचीन आध्यात्मिक जड़ों को दर्शाती हैं। यह शहर अपनी आस्था और परंपराओं को मजबूती से पकड़े हुए है।
2. आधुनिकता का स्वरूप: दूसरी ओर, शहर आधुनिकता के झकोरों से भी अछूता नहीं है।
कवि ने इसे "आधा जल में, आधा मंत्र में, आधा फूल में और आधा नींद में" कहकर इसकी मिश्रित वास्तविकता को उभारा है।
यह शहर एक पैर पर खड़ा है (परंपरा और अध्यात्म में डूबा हुआ) और दूसरा पैर अनदेखे आधुनिक यथार्थ (बदलाव) की ओर बढ़ा रहा है। यहाँ भिक्षुकों के कटोरे में उतरता वसंत आधुनिक जीवन की कड़वी सच्चाई को भी बयान करता है।
Step 3: Final Answer:
बनारस अपनी सदियों पुरानी आध्यात्मिक मान्यताओं को सहेजते हुए आधुनिक जीवन की गतिशीलता और बदलावों को भी अपने भीतर समेटे हुए है। यही प्राचीनता और आधुनिकता का सुंदर मिश्रण कविता का मूल भाव है।
Quick Tip: बनारस के जीवन की गति को दर्शाने के लिए कवि द्वारा प्रयुक्त शब्द "धीरे-धीरे" का उल्लेख अवश्य करें। यह धीमी गति शहर की प्राचीनता और स्थायित्व का प्रतीक है।
बड़ी बहुरिया का संदेश ले जाते समय हरगोबिन के मन में क्या द्वंद्व चल रहा था?
Step 1: Understanding the Concept:
यह प्रश्न फणीश्वरनाथ 'रेणु' की प्रसिद्ध आंचलिक कहानी 'संवदिया' से लिया गया है।
हरगोबिन एक पेशेवर संवदिया (संदेशवाहक) है, जिसे बड़ी बहुरिया की दयनीय स्थिति का करुण संदेश उसके मायके पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गई है।
Step 2: Detailed Explanation:
हरगोबिन जब बड़ी बहुरिया का संदेश लेकर उसके मायके पहुँचता है, तो उसके मन में कर्तव्य और भावनाओं के बीच एक गहरा मनोवैज्ञानिक द्वंद्व उत्पन्न हो जाता है:
1. संवदिया का पेशेवर कर्तव्य: एक संवदिया के रूप में उसका परम धर्म था कि वह भेजने वाले का संदेश ज्यों-का-त्यों (बिना एक शब्द बदले या छिपाए) प्राप्तकर्ता तक पहुँचाए।
बड़ी बहुरिया का संदेश अत्यंत करुण था—वह भुखमरी का शिकार थी, उधार मांगकर और बथुआ का साग खाकर दिन काट रही थी।
2. गाँव की इज्जत और स्वाभिमान: दूसरी ओर, हरगोबिन के भीतर का 'गाँव का स्वाभिमान' जाग उठता है।
वह सोचता है कि बड़ी बहुरिया उसके गाँव की 'लक्ष्मी' है। यदि वह गरीबी के कारण गाँव छोड़कर अपने मायके चली गई, तो पूरे गाँव की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।
उसे इस बात पर गहरी शर्म आती है कि क्या एक पूरा गाँव मिलकर एक बेसहारा औरत का पेट नहीं पाल सकता।
Step 3: Final Answer:
अंततः गाँव की इज्जत और बड़ी बहुरिया के सम्मान का भाव उसके पेशेवर कर्तव्य पर भारी पड़ता है। इसी द्वंद्व के कारण वह मायके वालों से झूठ बोल देता है कि बड़ी बहुरिया गाँव में कुशल से है।
Quick Tip: आंचलिक कहानियों में 'गाँव की इज्जत' (Village Honor) एक बहुत बड़ा प्रेरक तत्व होता है। हरगोबिन का यह निर्णय उसके चरित्र की संवेदनशीलता और ग्रामीण स्वाभिमान को दर्शाता है।
पारो और संभव की पहली मुलाकात का वर्णन लेखक ने किस प्रकार किया है?
Step 1: Understanding the Concept:
यह प्रश्न ममता कालिया की कहानी 'दूसरा देवदास' पर आधारित है।
कहानी में मुख्य पात्र पारो और संभव के बीच प्रेम का उदय एक अत्यंत पवित्र, आध्यात्मिक और अप्रत्याशित परिवेश में होता है।
Step 2: Detailed Explanation:
पारो और संभव की पहली मुलाकात हरिद्वार के सबसे पवित्र घाट 'हर की पौड़ी' पर होती है।
1. आध्यात्मिक परिवेश: उस समय शाम का वक्त था और गंगा आरती का अलौकिक, भक्तिमय वातावरण छाया हुआ था। दीपकों की रोशनी और मंत्रों की गूंज से माहौल अत्यंत पवित्र था।
2. आकस्मिक भेंट: संभव वहाँ यूँ ही घूम रहा होता है, जबकि पारो एक पुरोहित के साथ वहाँ पूजा और अनुष्ठान कर रही होती है।
पूजा के दौरान, अचानक दोनों के हाथ आपस में टकरा जाते हैं।
3. मौन आकर्षण: इस अचानक हुए स्पर्श से पारो थोड़ी चौंक जाती है और संभव की ओर एक तीखी लेकिन मासूम नज़र डालती है।
संभव पारो के इस भोलेपन, पवित्रता और सुंदरता पर मुग्ध हो जाता है। दोनों के बीच कोई लंबी बातचीत नहीं होती, यह केवल एक मौन और संक्षिप्त मुलाकात थी।
Step 3: Final Answer:
धर्म और अध्यात्म की पृष्ठभूमि में हुई यह मौन, संक्षिप्त और आकस्मिक मुलाकात ही दोनों के मनों में प्रेम और आकर्षण का बीज बो देती है, जिसे लेखक ने अत्यंत शालीनता से वर्णित किया है।
Quick Tip: इस मुलाकात का महत्व इसके स्थान (हरिद्वार) में छिपा है। लेखिका ने आधुनिक प्रेम को पुराने 'देवदास' जैसी दुखद कहानी से अलग करते हुए उसे एक पवित्र और सकारात्मक शुरुआत दी है।
'कुटज' को 'अपराजेय जिजीविषा' (जीने की इच्छा) का प्रतीक क्यों माना गया है?
Step 1: Understanding the Concept:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध 'कुटज' में हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों पर पाए जाने वाले एक साधारण से पौधे 'कुटज' का दार्शनिक वर्णन किया गया है।
लेखक ने इसे मानव जीवन के लिए एक महान आदर्श और प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया है।
Step 2: Detailed Explanation:
'अपराजेय जिजीविषा' का अर्थ है - हार न मानने वाली जीने की प्रबल इच्छा। कुटज को इसका प्रतीक निम्नलिखित कारणों से माना गया है:
1. प्रतिकूल परिस्थितियाँ: कुटज का पौधा हिमालय की सूखी, नीरस, कठोर और पथरीली चट्टानों के बीच उगता है। वहाँ न तो उपजाऊ मिट्टी है और न ही आसानी से मिलने वाला जल।
2. कठोर संघर्ष: इतनी भयंकर और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद कुटज कभी मुरझाता नहीं है। वह पाषाण (कठोर पत्थरों) की छाती चीरकर पाताल से अपने लिए जल और पोषण खींच लाता है।
3. स्वावलंबन और उल्लास: वह भयंकर गर्मी, लू और तूफानों के बीच भी सीना तानकर खड़ा रहता है, हरा-भरा रहता है और मुस्कुराते हुए फूल खिलाता है। वह किसी से दया की भीख नहीं मांगता।
Step 3: Final Answer:
लेखक के अनुसार, कुटज का यह संघर्ष और स्वावलंबन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विकट क्यों न हों, मनुष्य को स्वाभिमान के साथ जीना चाहिए और कभी घुटने नहीं टेकने चाहिए। इसी कारण उसे 'अपराजेय जिजीविषा' का प्रतीक कहा गया है।
Quick Tip: उत्तर में 'पाषाण भेदकर पोषण प्राप्त करना' और 'स्वावलंबन' (Self-reliance) जैसे शब्दों का प्रयोग करने से परीक्षक पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है।
लेखक ने कोइया (जलपुष्प) और सांपों के प्रति अपने बचपन के अनुभवों को कैसे साझा किया है?
Step 1: Understanding the Concept:
यह प्रश्न 'अंतराल' भाग-2 के संस्मरणात्मक पाठ 'बिस्कोहर की माटी' से लिया गया है, जिसके लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी हैं।
इस पाठ में लेखक ने अपने ग्रामीण बचपन की स्मृतियों, प्राकृतिक सौंदर्य और गाँव के यथार्थ (भय और आकर्षण) को उकेरा है।
Step 2: Detailed Explanation:
लेखक ने प्रकृति के दो भिन्न रूपों—सौंदर्य (आकर्षण) और भय—का चित्रण एक साथ किया है:
1. कोइया के प्रति आकर्षण (प्रकृति का सौंदर्य): लेखक 'कोइया' (एक प्रकार का कुमुद या जलपुष्प) का अत्यंत मनोहारी वर्णन करते हैं।
शरद ऋतु (Autumn) के आगमन पर गाँव के ताल-तलैयों और गड्ढों में कोइया के फूल बड़ी संख्या में खिल उठते हैं। इसकी कोमलता, सुंदरता और सुगंध लेखक के बाल-मन को बहुत लुभाती थी और उन्हें गहरी खुशी देती थी।
2. साँपों के प्रति भय और कौतूहल (प्रकृति का यथार्थ): दूसरी ओर, लेखक गाँव के यथार्थ और साँपों से जुड़े अपने डरावने अनुभवों को साझा करते हैं।
गाँव में कई प्रकार के साँप पाए जाते थे, जैसे ढोंढ़ा और मजठवा। बच्चों में साँपों को लेकर स्वाभाविक रूप से भारी दहशत और डर होता था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा कौतूहल (Curiosity) भी रहता था।
'ढोंढ़ा' को विषहीन जल-साँप माना जाता था, जिससे बच्चे ज्यादा नहीं डरते थे, लेकिन अन्य विषैले साँपों का सामना होना साक्षात् मृत्यु के समान लगता था।
Step 3: Final Answer:
इस प्रकार, लेखक ने कोइया के माध्यम से प्रकृति की मनमोहक कोमलता और साँपों के माध्यम से उसकी भयानकता का जीवंत चित्र खींचा है, जो ग्रामीण जीवन के उनके वास्तविक अनुभव थे।
Quick Tip: 'बिस्कोहर की माटी' एक आंचलिक संस्मरण है। उत्तर में स्थानीय शब्दों जैसे 'कोइया' और 'ढोंढ़ा' का प्रयोग ग्रामीण परिवेश की प्रामाणिकता को बढ़ाता है। प्रकृति का यह द्वैत रूप (सौंदर्य और भय) इस पाठ की मूल आत्मा है।
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